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________________ सर्व विशुद्ध ज्ञानाधिकार ५७७ कद्रव्यत्वेन ततोऽन्यत्वे सति तन्मयो भवति ततो निमित्तनैमित्तिकभावमात्रेणैव तत्र कर्तृकर्मभीतृभोग्यत्वव्यवहारः । तथात्मापि पुण्यपापादिपुद्गल परिणामात्मकं कर्म करोति कायवाङ्मनोभिः पुद्गलद्रव्यपरिणामात्मकः करणैः करोति कायवाङ्मनांसि पुद्गलद्रव्यपरिणामात्मकानि करानि गृह्णाति सुखदुःखादिपुद् गलद्रव्य परिणामात्मकं पुण्यपापादिकर्मफलं भुंक्ते च नत्वनेकद्रव्यत्वेन ततोऽन्यत्वे सति तन्मयो भवति ततो निमित्तनैमित्तिकभावमात्रेणैव तत्र कर्तृ कर्मभो भोग्यत्वव्यवहारः । यथा च स एव शिल्ली चिकीर्षुश्चेष्टानुरूपमात्मपरिणामात्मकं कर्म ततः - अव्यय । सिपिओ शिल्पिकः - प्रथमा एकवचन । कम्मं कर्म - द्वितीया एकवचन । कुब्बइ करोति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन क्रिया । सो सः प्र० ए० । तम्मओ तन्मयः- प्र० ए० । होइ भवति - वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन क्रिया । जीवो जीवः प्रथमा एक कम्मं कर्म - द्वितीया एक० । करहिं करण :-- तृ० बहु० । गिण्हइ गृह्णाति - वर्तमान लद् अन्य पुरुष एकवचन क्रिया । कम्मफलं कर्मफल- द्वितीया एक णामस्वरूप कर्मको करता है, हथौड़ा श्रादि परद्रव्यके परिणामस्वरूप करणों द्वारा करता हैं, हथौड़ा आदि परद्रव्यके परिणामस्वरूप करणों को ग्रहण करता है, और ग्राम धन यादि परद्रव्यके परिणामस्वरूप कुण्डलादि कर्मफलको भोगता है, किंतु अनेकद्रव्यत्वके कारण उनसे याने कर्म करण आदि अन्यपता होनेपर उनसे तन्मय नहीं होता, इस कारण वहाँ निमित्तनैमि तिभावमात्र से ही उनके कर्ता-कर्मपनेका और भोक्ता भोग्यपनेका व्यवहार है । उसी प्रकार आत्मा भी पुण्य पाप आदि पुद्गलद्रव्यस्वरूप कर्मको करता है, मन वचन काय पुद्गलद्रव्य स्वरूप करणोंके द्वारा कर्मको करता है, मन वचन काय पुद्गलद्रव्य के परिणामस्वरूप करणों को ग्रहण करता है और सुख-दुःख श्रादि पुद्गल द्रव्य के परिणामस्वरूप पुण्य पाप आदि क के फलको भोगता है, किन्तु अनेक द्रव्यपनेके कारण उनसे अन्य होनेपर उनसे तन्मय नहीं होता । इस कारण निमित्तनैमित्तिकभाव मात्र से ही वहां कर्ता कर्मपने व भोक्ता भोग्यपनेका व्यवहार है । जैसे वही शिल्पी करनेका इच्छुक हुआ अपने हस्त प्रादिकी चेष्टारूप अपने परिणामस्वरूप कर्मको करता है और दुःखस्वरूप अपने परिणामरूप चेष्टामय कर्मके फलको भोगता है उन परिणामोंको अपने एक ही द्रव्यपनेके कारण अनन्य होनेसे उनसे तन्मय होता है । इसलिये उनमें परिणाम- परिणामी भावसे कर्ता कर्मपनेका तथा भोक्ता भोग्यपनेका निश्चय है । उसी तरह श्रात्मा भी करनेका इच्छुक हुआ अपने उपयोगको तथा प्रदेशोंकी चेष्टारूप अपने परिणामस्वरूप कर्मको करता है और दुःख स्वरूप अपने परिणामरूप कर्मके फलको भोगता है और अपने एक ही द्रव्यपनेके कारण अन्यपता न होनेपर उनसे तन्मय होता है । इस कारण परिणाम परिणामी भावसे उसीमें कर्ता कर्मपनेका और भोक्ता भोग्यपनेका
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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