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________________ ५६७ सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार विशेषापेक्षया त्वज्ञानरूपस्य ज्ञानपरिणामस्य करणाकर्तृत्वमनुमंतव्यं तावद्यावत्तदादिशेयज्ञानभेदविज्ञानपूर्णत्वादात्मानमेवात्मेति जानतो विशेषापेक्षयापि ज्ञानरूपेणीव ज्ञानपरिणामेन परि. गममानस्य केवलं ज्ञातृत्वात्साक्षादकर्तुत्वं स्यात् ।। माऽकर्तारममो स्पृशंतु पुरुषं सांख्या इवाअप्पणो आत्मन:-षष्ठी ए. । कुणइ करोति-ब० अ० ए०। मिच्छमहाबो मिथ्यास्वभावः-प्र०ए। तुम्हं मुणंतस्स तव जानतः-षष्ठी ए० । अप्पा आत्मा णिच्चो नित्यः असंखिज्जपदेसो असंख्यातप्रदेशः देखियो तरह वस्तुस्वरूप है उस तरह काव्यमें दिखलाते हैं-क्षणिक इत्यादि । अर्थ ---इस लोकमें कोई एक क्षणिकवादी दार्शनिक तो आत्मतत्त्वको क्षणिक कल्पित करके अपने मनमें कर्ता भोक्तामें भेद करते हैं कर्ता अन्य है भोक्ता अन्य है उनके प्रज्ञानको यह चैतन्यचमत्कार हो स्वयं नित्य अमृतके समूहोसे सोंचता हुआ दूर करता है । भावार्थ-क्षणिकवादी कर्ता भोक्ता में भेद मानते हैं कि जो पहले क्षणमें वह दूसरे क्षणके नहीं है प्राचार्य करते हैं हम उनको क्या समझा ? यह चैतन्य ही उनका प्रज्ञान दूर करेगा जो कि अन स्वगोचर व नित्यरूप है । पहले क्षण जो प्रात्मा है वही दूसरे क्षरणमें कहता है, सो जो मैं पहले ४ वही हूं ऐसा स्मरण पूर्वक प्रत्यभिज्ञान उसको नित्यता दिखलाता है। इसलिये नित्यता र अनित्यताका सर्वथा एकांत मानना ये दोनों ही भ्रम हैं वस्तुस्वरूप नहीं है । स्माद्वारा शासन कथंचित नित्यानित्यरूप वस्तुका स्वरूप कहता है वही सत्यार्थ है।। अब ऐसे ही क्षणिक मानने वालोंको युक्तिसे काव्य द्वार! निषेध करते हैं-वृत्यंश इत्यादि । अर्थ-वृत्त्यशोंके भेदसे वृत्तिमानके सर्वथा नाशको कल्पः . "अन्य करता है अन्य भोक्ता है" ऐसा एकान्त मत प्रकाशित करो। भावार्थ-क्षण क्षणको प्रति अवस्थाभेदोंको वृत्त्यंश कहते हैं, उनको सर्वथा भेद जुदे जुदे वस्तु माननेसे अवस्थानोंका प्राश्रयरूप जो वृत्तिमान वस्तु है उसके नाशको कल्पना करके जो ऐसा मानते हैं कि कर्ता दूसरा है और भोक्ता कोई दूसरा ही है । उसपर प्राचार्य कहते हैं कि ऐसा एकान्त मत प्रकाशित करो। जहाँ अवस्थावान् पदार्थका नाश हुआ वहाँ अवस्थायें किसके प्राश्रय होकर रहेंगी? इस तरह पर्याय व द्रव्य दोनोंका नाश पाता है तब शून्यका प्रसंग होता है । प्रसंगविवरण-प्रनन्तरपूर्व गाथाचतुष्कमें यह निष्कर्ष दिखाया गया था कि परिणमनस्वभावी जीव मिथ्यात्वादि प्रकृत्युदयका निमित्त पाकर मिथ्यात्वादि भावकर्मरूप परिणाम जाता है । अब इन गाथावोंमें पूर्वपक्षपूर्वक उसी सिद्धान्तको पुष्ट किया गया है । तथ्यप्रकाश-(१) यहाँ मूल पूर्वपक्ष यह है कि जीव कूटस्थ ध्र व मपरिणामी अकर्ता है। (२) जोद जब एकान्तत: प्रकर्ता है तो अज्ञान, निद्रा, सुख, दुःख, मिथ्यात्व,
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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