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________________ । समयसार इति । यदा त्वनाद्यविद्याकंदलीमूलकंदायमानमोहानुवृत्तितंत्रतया दृशिज्ञप्तिस्वभावनियतवृत्तिरूपादात्मतत्त्वात्प्रच्युत्य परद्रव्यप्रत्ययमोहरागद्वेषादिभावकत्वगतत्वेन वर्तते तदा पुद्गलकर्मप्रदेशस्थितत्वात्पर मेकत्वेन युगपन्जानम गच्छेपन गरसमय इति प्रतीयते । एवं किल समयस्य वैविध्यमुद्धावति ।। २ ॥ अन्य द्रव्योंसे अत्यन्त एकक्षेत्रावगाहरूप होनेपर भी अपने स्वरूपसे न छूटनेसे टकोत्कीर्ण चैतन्यस्वभावरूप है, ऐसा जीव नामक पदार्थ समय है। जब यह सब पदार्थों के स्वभावके प्रकाशने में समर्थ ऐसे केवलज्ञानको उत्पन्न करने वाली भेदज्ञानज्योतिके उदय होनेसे सब परद्रव्योंसे पृथक् होकर दर्शन-ज्ञान में निश्चित प्रवृत्तिरूप प्रात्मतत्वसे एकत्वरूप होकर प्रवृत्ति करता है, तब दर्शन-ज्ञान-चारित्रमें स्थिर होनेसे अपने स्वरूपको एकत्वरूपसे एक कालमें जानता तथा परिणमन करता हुआ स्वसमय कहलाता है । और जब यह अनादि अविद्यारूप मूल वाले कंदके समान मोहके उदय के अनुसार प्रवृत्तिकी प्राधीनतासे दर्शन-ज्ञान स्वभावमें निश्चित बृत्तिरूप प्रात्मस्वरूपसे छूट परद्रव्य के निमित्तसे उत्पन्न मोह, रागद्वेषादि भावोंमें एक रूप हो प्रवृत्त होता है, तब पौद्गलिक कार्मण प्रदेशोंमें स्थित होनेसे परद्रव्यको अपनेसे अभिन्न, एक कालमें जानता है तथा रागादिरूप परिणमन करता है, अतः परसमय ऐसी प्रतीति होती है । इस तरह इस जीव नामक पदार्थके स्वसमयं और परसमय-~ऐसे दो भेद प्रकट होते हैं । भावार्थ-जीव नामक वस्तुको पदार्थ कहा है । वह इस प्रकार है कि पद तो 'जीव' ऐसे अक्षर समूह रूप है और इस पदसे जो द्रव्यपर्यायरूप अनेकांतस्वरूप निश्चित किया जाय, वह उसका अर्थ है । ऐसा पदार्थ उत्पाद-व्यय-धोव्यमयी सत्ता स्वरूप है। दर्शनज्ञानमय चेतनास्वरूप है, अनन्तधर्मस्वरूप द्रव्य है (और जो द्रव्य है, वह वस्तु है, गुण-पर्यायवान है) वह स्व-परप्रकाशक ज्ञान अनेकाकाररूप एक है, आकाशादिकसे भिन्न असाधारण चैतन्यगुणस्वरूप है और यद्यपि वह अन्य द्रव्योंसे एक क्षेत्रावगाहरूप स्थित है तो भी अपने स्वरूपको नहीं छोड़ता। ऐसा जीव नामक पदार्थ समय है । वह जब अपने स्वभावमें स्थित होता है, तब तो स्वसमय है और जब पौद्गलिक कर्मप्रदेशों में स्थित होता हुमा परस्वभाव -- रागद्वेष-मोह-स्वरूप परिणमन करता है तब परसमय है । ऐसे इस जीवके द्विविधता पाती है । प्रसङ्गविवरण---समयसारके परिभाषण में पहिले समयसार शब्दका वाच्य बताना चाहिये । सो समयसार शब्द द्वारा वाच्य अनादि अनन्त अहेतुक चैतन्यस्वरूपको एकदम कसे समझाया जा सकता है सो पर्यायमुखेन पहिले समय याने आत्माको, स्वसमय व परसमयके लक्षणको बताया गया है ताकि प्रासानीसे यह बात समझो जा सके कि जो स्वसमय ब परसमयमें रहने वाला एकस्वरूप है वह समय है। तथ्यप्रकाश-(१) उत्पादध्ययधोव्ययुक्त होने से जीव सत् है, पदार्थ है, इस कथनसे A
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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