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________________ ५२८ समयसार द्रव्यं यदुत्पद्यते गुणस्तत्तैर्जानीानन्यत् । यथा कटकादिभिस्तु पर्यायः कनकमनन्यदिह ॥३०८|| जीवस्याजीवस्य तु ये परिणामास्तु दशिताः सूत्रे । तं जीवमजीवं वा तैरनन्यं बिजानीहि ।।३०६।। न कुतश्चिदप्युत्पन्नो यस्मात्कार्य न तेन स आत्मा। उत्पादयति न किंचित्कारणमपि तेन न स भवति ।। कर्म प्रतीत्य कर्ता कतार तथा प्रतीत्य कर्माणि । उत्पद्यते च नियमात्सिद्धिस्तु न दृश्यतेऽन्या ।।३११॥ जोवो हि तावत्क्रमनियमितात्मपरिणामरुत्पद्यमानो जीव एव नाजीवः, एवमजीवोऽपि क्रमनियमितात्मपरिणामरुत्पद्यमानोऽजीव एव न जीवः, सर्वद्रव्याणां स्वपरिणामः सह तादात्म्यात् कंकणादिपरिणाम: कांचनवत् । एवं हि जीवस्य स्वपरिणामरुत्पद्यमानस्याप्यजीवेन सह तु, यत, परिणाम, तु, दर्शित, सूत्र, तत्, जीब, अजीब, वा, तत्, अन्य, न, कुतश्चित्, अपि, उपपन्न, यत्, कार्य, न, तत्, तत्, आत्मन्, न, किचित्, कारण, अपि, तत्, न, तत्, कर्मन्, कर्तृ, तथा, कर्मन्, च, नियम, वह प्रात्मा [कुतश्चिदपि] किसीसे भी [न उत्पन्नः] उत्पन्न नहीं हुप्रा है [तेन] इस कारण वह [कार्य] किसीका कार्य [न भवति] नहीं है और [किंचिदपि] किसी अन्यको भी [न उत्पादयति] उत्पन्न नहीं करता [तेन] इस कारण [स:] वह [कारणमपि] किसोका कारण भो [न] नहीं है । [नियमात्] नियमसे [कर्म प्रतीत्य] कर्मको आश्रय करके ही तो [कर्ता] कर्ता होता है [तथा च] और [कर्तारं प्रतीत्य] कर्ताको आश्रय करके [कर्माणि] कर्म [उत्पद्यते] उत्पन्न होते हैं [अन्या तु सिद्धिः] अन्य प्रकार कर्ता-कर्मको सिद्धि [न दृश्यते] नहीं देखी जाती। तात्पर्य-वास्तवमें कर्ता-कर्म भिन्न-भिन्न द्रव्यमें नहीं होते, इस कारण जीव किसी अन्यका न तो कर्ता है और न किसी अन्यका कार्य है। . टोकार्थ - जीव प्रथम तो क्रमनियमित अपने परिणामोंसे उत्पन्न हुअा अजीव हो है जीव नहीं है, क्योंकि सभी द्रव्योंका अपने परिणामोंके साथ तादात्म्य है, जैसे कंकरणादि परि. णामोसे सुवणं उत्पन्न होता है वह कंकणादिसे अन्य नहीं है उनसे तादात्म्यस्वरूप है उसो तरह सब द्रव्य हैं। इस प्रकार अपने परिणामोंसे उत्पन्न हुए जीवका अजीवके साथ कार्य कारणभाव सिद्ध नहीं होता; क्योंकि सब द्रव्योंका अन्य द्रव्यके साथ उत्पाद्य-उत्पादक भावका प्रभाव है । और उस कार्यकारणभावकों सिद्धि न होनेपर अजीवके जीवकर्मत्व सिद्ध नहीं होता और अजीवके जीवकर्मत्व सिद्ध न होने परसे कर्ता-कर्मके अनन्यापेक्ष सिद्ध होनेसे जीव के अजीत्रका कर्तापना सिद्ध नहीं होता। इस कारण जीव परद्रव्यका अकर्ता ही ठहरता है । भावार्थ-सब द्रव्योंके परिणाम पृथक्-पृथक् हैं। अपने-अपने परिणामोंके सब कर्ता हैं। प्रत्येक पदार्थ स्वयं अपने परिणामोंके कर्ता हैं वे परिणाम उनके कर्म हैं। निश्चयतः किसी का किसीसे भी कर्ताकर्मसम्बन्ध नहीं है, इस कारण जोब अपने परिणामोंका कर्ता है जीवके
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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