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________________ मोक्षाधिकार ५२३ चाव---कम्मं जं पुवकयं सुहासुहमसोयवित्थरबिसेस । तत्तो रिणयत्तए अप्पयं तु जो सो पडिकम्मरणं । इत्यादि । अतो हताः प्रमादिगो ता. सुखासीत प्राम चापलमुन्नीलितमालबनं । प्रात्मन्येवालानितं चित्तमासंपूर्णविज्ञानघनोपलब्धेः ॥१८८।। यत्र प्रतिक्रमणमेव विषं प्रणीतं तत्राप्रतिक्रमणमेव सुधा कुतः स्यात् । तत्कि प्रमाद्यति जनः प्रपतनधोऽधः कि नोर्ध्वमूर्ध्वमधिरोहति निष्प्रमादः ॥१८६ ।। प्रमादकलितः कथं भवति शुद्धभावोऽलसः कषायभरगौरवादलसता धारणा णियत्ती निवृत्तिः जिंदा निन्दा गरहा गर्दा सोही शुद्धिः अविहो अष्टविधः विसकुंभो विषभःप्रथमा एकवचन । होइ भवति-वर्तमान लट् अन्य पुरुप एक । अप्पडिक्कमणं अप्रतिक्रमणं अप्पडिसरणं अज्ञानावस्था जो अप्रतिक्रमणादिक थे उनका तो कथा ही क्या ? वे तो विषकुम्भ है हो । यहाँ तो जो द्रव्यप्रतिक्रमणादिक शुभप्रवृत्तिरूप थे, उनका एकांत पक्ष छुड़ाने को उन्हें विषकुम्भ कहा है, क्योंकि शुभप्रवृत्तियाँ कर्मबन्धको ही कारण हैं। अप्रतिक्रमण व प्रतिक्रमणसे रहित जो तीसरी भूमि शुद्ध प्रात्मस्वरूप है वह अमृतकृम्भ कहा गया है, उस भूमिमें चढ़नेको उपदेश किया है । प्रतिक्रमणादिकको विषकुम्भ सुनकर जो प्रमादी होता है उसको कहते हैं कि यह जन नीचे नीचे क्यों गिरता है तीसरी भूमिमें ऊँचा-ऊँचा क्यों नहीं चढ़ता ? अब इसी मर्थको दृढ़ करनेके लिये काव्य कहते हैं--प्रमाद इत्यादि । अर्थ-प्रमादयुक्त प्रालस्य भाव कसे शुद्ध भाव हो सकता है ? क्योंकि कषायके बोझके गौरवसे हितकार्यमें पालस्य होना हो तो प्रमाद है । इस कारण प्रात्मोकरससे भरे स्वभावमें निश्चल हुमा मुनि परम शुद्धताको प्राक्ष होता है और थोड़े समयमें ही कर्मबन्धसे छूट जाता है। भावार्थप्रमाद तो कषायको प्रचुरतासे होता है, इसलिये प्रमादोके शुद्धभाव नहीं होते । जो मुनि उद्यम करके स्वभावमें प्रवर्तता है वह शुद्ध होकर मोक्षको प्राप्त होता है। अब मुक्त होनेका अनुक्रम काव्य में कहते हैं-त्यक्त्वा इत्यादि । अर्थ---जो पुरुष निश्चयसे अशुद्धताके करने वाले सब परद्रव्योंको छोड़कर स्वयं अपने निजद्रव्यमें लीन होता है, वह पुरुष नियमसे सब अपराधोंसे रहित हुना बंधके नाशको प्राप्त होकर नित्य उदयरूप हुमा अपने स्वरूपके प्रकाशरूप ज्योतिसे निर्मल उछलता जो चैतन्यरूप अमृतका प्रवाह उससे जिसको महिमा पूर्ण है, ऐसा शुद्ध होता हुआ कर्मोंसे छूटता है । भावार्थ-मुमुक्षु पहले तो समस्त परद्रव्यका त्यागकर अपने प्रात्मस्वरूप में लीन होता है, सो सब रागादिक अपराधोंसे रहित होकर आगामी बंधका नाश करता है सो फिर नित्य उदयरूप केवलज्ञानको पाकर शूद्ध होकर समस्त कर्मों का नाशकर मोक्षको प्राप्त करता है। यही मोक्ष होनेको रोति है । इस तरह मोक्षकी विधि बताकर मोक्षाधिकार पूर्ण किया जा रहा है ।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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