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मोक्षाधिकार निरपराधो बंधनं नैव जातु । नियतमयमशुद्धं स्वं भजन सापराधो भवति निरपराधः साधु शुद्धात्मसेवी ।।१८।। ॥ ३०४-३०५ ।। एय? एकार्थ-प्रथमा एक नेपालको नयाल राक्ष:-प्र०ए० । जो यः-प्र० ए. 1 खलु-अव्यय । वेदा
तयिता-प्र०ए। सो सः-प्र० ए०। होइ भवति--वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन क्रिया। अवर.धो अपराध:--प्र०ए०। णिरावराधो निरपराध:-प्र०ए०। णिस्संकिओ निःशंकित:-प्र० ए०। आराहणाइ आराधनया-तृतीया एक० । णिच्च नित्य--अव्यय । वट्टइ वर्तते-प्र० एक० । अहं-प्र० एक० । ति इतिअव्यय । जाणतो जानन्-प्रथमा एकवचन ।। ३०४-३०५॥ भावार्थ-जो आत्मा अपनेको सहज अधिकार स्वरूप निरखता है वह निरपराध है व निर्बन्ध है।
प्रसंगधिवरण-अनन्तरपूर्व गाथात्रयमें बताया था कि अपराधी जीव सशंक होता हमा कर्मबद्ध हो जाता है और निरपराध प्रात्मा नि:शंक और प्रबन्ध रहता है। अब उसी अपराधके विषय में इन दो गाथावोंमें बताया गया है कि वह अपराध क्या है और निरपराध को स्थिति क्या होती है ?
तथ्यप्रकाश-(१) राध अात्मसिद्धिको कहते हैं । (२) जिसके राध नहीं है उस भावको अपराध कहते हैं । (३) राधके इतने और नाम भाव समझने के लिये जानना--१संसिद्धि, २- सिद्धि, ३- साधन व ४- पाराधना । (४) विभावपरिणामरहित निविकल्पसमाधिमें स्थित होकर निज शुद्धात्माकी उपलब्धि होना संसिद्धि है । (५) परद्रव्यका परिहार करके शुद्ध प्रात्मामें मग्नता होना सिद्धि है । (६) सर्वविकारभावोंसे हटकर शुद्ध भैतन्यस्वरूपकी सेवा करना साधन है । (७) विकारभावका परिहार करके शुद्ध चित्स्वरूप प्रात्माको उपासना करना प्राराधना है । (८) जिसके परद्रव्यका ग्रहण है, परभावमें प्रात्मरूपकी मान्यता है उसके शुद्धात्मसिद्धिका प्रभाव है । (९) जिसके शुद्धात्मसिद्धि नहीं है वह सापराध है। (१०) सापराधके सदैव बन्धशङ्का रहती है व बन्ध होता है, क्योंकि वह शुद्धात्मतत्त्वका प्रनारापक है । (११) जो समग्र परद्रव्योंका परिहार करता है उसके शुद्धात्मसिद्धि होती है। (१२) जिसके शुद्धाश्मसिद्धि है उसके बन्धशङ्काकी असंभवता है, क्योंकि उसके ज्ञान मात्र शुद्ध अन्तस्तत्त्वको उपासना बनी रहनेसे वह आराधक ही है।
सिद्धान्त---(१) शुद्ध अन्तस्तत्त्य के प्राराधक शुद्धात्मसेवी निरपराध है। (२) प्रशुद्ध सोपाधि सविकार प्रात्माको सेवा करने वाले सापराध हैं। (३) निरपराध प्रात्मा निर्बन्ध होते हैं । (४) सापराध जीव अनन्त कोको बांधते हैं।
दृष्टि-- १- शुद्धनिश्चयनय (४६) । २- अशुद्धनिश्चयनय (४७) । ३- प्रतिषेधक शुद्धनय (४६) । ४- परकर्तृत्व प्रसद्भूत व्यवहार (१२६) ।