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________________ समयसार दस्थानीयान् भाव द्रव्यस्तवाभ्यां स्वात्मनि परात्मनि च निधायानादिनिधनश्रुतप्रकाशितत्वेन निखिलार्थसार्थसाक्षात्कारिकवलिपपीतत्वेन श्रुतकेवलिभिः स्वयमनुभवद्भिरभिहितत्वेन च लम्भने, बच परिभाषणं, अय गनी, शु श्रवणे, भण शब्दार्थ । पदविवरण-बंदित्वा-अन्नमाप्तिकी क्रिया । सर्वसिद्धान्-द्वितीया बहुवचन', अनमानिकी क्रियाका कर्म। ध्रुवां, अचला, अनुपमाहितीया एकवचन, गतिका विशेषण । गति-हितीया एकवचन । प्राप्तान-द्वितीया बहुवचन, सिद्धोंका विशेषण। वक्ष्यामिकुन्दाचार्य जो कुछ वर्णन करना हृदयमें रख रहे हैं उसमें से मंगलाचरण रूप तथा प्रतिज्ञासंकल्परूप प्रथम गाया प्रकट होती है। मैं [ध्र वां] ध्र व अचलां] अचल और [अनुपमा] अनुपम [गति गतिको [प्राप्ता] प्राप्त हुए [सर्वसिद्धान्] सभी सिद्धोंको वंदित्या] नमस्कार कर, [अहो] हे भव्यो, [श्रुतकेवलिभरिंगतं] श्रुत केवलियों द्वारा कहे हुए [इदं] इस [समयप्रामृतं] समयसार नामक प्राभृतको [वक्ष्यामि] कहंगा । तात्पर्य-सिद्धभगवान होनेका प्रोग्राम रखते हुए प्राचार्य सिद्धभगवंतको नमस्कार करके सिद्ध होने के उपायभूत आराध्य समयप्रतिपादक समयप्राभृतका कथन करेंगे । टीकार्थ---यहाँ अथ शब्द मंगलके अर्थको सूचित करता है । और प्रथमत एव (ग्रंथकी पादिमें) सब सिद्धोंको भाव-द्रव्यस्तुतिसे अपने प्रात्मामें और परके आत्मामें स्थापन कर इस समय नामक प्राभृतका (हम) भाववचन और द्रव्यवचन द्वारा परिभाषण प्रारम्भ करते हैं, इस प्रकार श्री कुन्दकुन्दाचार्य कहते हैं । वे सिद्धभगवान् सिद्ध नामसे साध्य जो प्रात्मा उसके प्रतिच्छन्दके स्थानीय आदर्श हैं । जिनका स्वरूप संसारी भव्य जीव चितवन कर, उनके समान अपने स्वरूपका ध्यान कर उन्हीं के समान हो जाते हैं। और चारों गतियोंसे विलक्षण जो पंचमगति मोक्ष, उसे पा लेते हैं। वह पंचमगति स्वभावसे उत्पन्न हुई है, इसलिये ध्रुवरूपका अवलम्बन करती है, इस विशेषणसे सिद्ध हुआ कि चारों गतियां परनिमित्तसे होती हैं, इसलिये ध्र व नहीं है, विनश्वर हैं, इसलिये सिद्ध दशाका चारों गतियोंसे पुथपना प्रसिद्ध हुप्रा । वह गति अनादिकालसे अन्य भावके निमित्तसे हुए परमें भ्रमणको विश्रांति (प्रभाव) के वशसे अचल दशाको प्राप्त हुई है, इस विशेषणसे चारों गतियोंमें परनिमित्तसे जो भ्रमण था उसका व्यवच्छेद हुन । जगतमें समस्त जो उपमायोग्य पदार्थ हैं, उनसे विलक्षण है~~-अद्भुत माहात्म्यके कारण जो किसीकी उपमा नहीं पा सकती । इस विशेषणसे चारों गतियों में किसी से समानता भी पायी जाती है इसका निराकरण हुया । वह अपवर्गरूप है, धर्म अर्थ और काम इस पिवर्गमें न होनेसे वह मोक्षगति अपवर्ग कही गई है । ऐसी पंचम गतिको सिद्धभगवान् प्राप्त हुए हैं । कैसा है समयप्राभृत ? अनादिनिधन परमागम शब्द-ब्रह्म द्वारा प्रकाशित होनेसे तथा सब पदार्थोंके समूहके साक्षात् करने वाले केवली भगवान् सर्वज्ञके द्वारा प्रणीत
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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