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________________ मोक्षाधिकार ५१३ विविधा भावा पृथग्लक्षणा: तेऽहंनास्मि यतोऽत्र ते मम परद्रव्यं समग्ना अपि ॥१८५।। परद्रव्यग्रहं कुर्वन बध्येतवापराधवान् । बध्येतानपराधो न स्वद्रव्ये संवृतो मुनिः ॥१८६।। ।।३००॥ वचन क्रिया । वुहो बुधः-प्रथमा एक० । णाचं ज्ञात्वा-कृदंत असमाप्सिकी सम्बंधार्थक्रिया प्रक्रिया, अव्यय । सन्चे सर्वान् पराइए परकीयान् भावे भावान-द्वितीया बहु० । मझ मम-षष्ठी एकः । इणं इदम्-प्रथमा एक० । इति अव्यय । श्यणं वचनं-द्वितीया एक० कर्मकारक । जाणतो जानन्-प्र० एक कृदन्त कर्बर्थप्रक्रिया । अप्पयं आत्मानं-द्वि० एक० । सुद्धं शुद्ध-द्वितीया एकवचन ॥ ३०० ।। भी समस्त परद्रव्यको अपना नहीं बनाता, अपने निज भावको हो अपने जान अनुभवता है। __ अब इसी प्रर्थको कलशरूपमें कहते हैं-सिद्धांतो इत्यादि । अर्थ---उदात्त चिलके चरित्र वाले मोक्षके इच्छुक पुरुष इस सिद्धान्तका सेवन करें कि मैं तो सदा शुद्ध चैतन्यमय एक परमज्योति ही हूं और जो ये अनेक प्रकारके भिन्न लक्षणरूप भाव हैं वे मैं नहीं हूं, क्योंकि वे सभी भाव मेरे लिये परद्रव्य हैं 1 भावार्थ-स्वरूप निरखकर सदा ऐसा अनुभव करना चाहिये कि मैं शुद्ध चैतन्यमात्र हूं। प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्व गाथाद्वयमें बताया गया था कि प्रज्ञासे दर्शनज्ञानात्मिका चेतना ही ग्रहण करना चाहिये, चेतनाके अतिरिक्त अन्य सभी भाव हेय हैं । अब इस गाथामें उन्हीं अन्य सर्व भावोंको हेयताका समर्थन किया गया है । तथ्यप्रकाश--(१) जो प्रात्मा व परके नियत स्वलक्षण विभागमें पड़े, वह प्रशा है । (२) प्रज्ञा द्वारा जो स्व-परका विभाग कर स्वको स्वरूपसे, परको पररूपसे जाने वह ज्ञानी है । (३) ज्ञानी एक चिन्मात्र भावको अात्मस्वरूप जानता है। (४) ज्ञानी चोतनातिरिक्त सर्व भावोंको परकीय जानता है । (५) स्वकीय व परकीय भावोंको जानता हुमा ज्ञानी परभावोंको अपना मान हो नहीं सकता । (६) पर व आत्मामें निश्चयसे स्वस्वामीसम्बन्ध रंच भी नहीं है । (७) सर्व उपायोंसे चैतन्यभाव ही ग्रहण किया जाने योग्य है । (८) चेतनातिरिक्त सर्वभाव छोड़ने योग्य हो हैं । सिद्धान्त-(१) मुझमें परपदार्थका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव कुछ भी नहीं है । (२) मुझमें स्वका ही द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव है। दृष्टि-१- परद्रव्यादिग्राहक द्रव्यार्थिकनय (२६)। २- स्वद्रव्याटिग्राहक द्रव्याथिकनय (२८)। प्रयोग-परकीयभावको पर जानकर उनसे उपयोग हटाना और निज शाश्वत सहज चैतन्यस्वरूपको प्रात्मस्वरूप जानकर इस निज अन्तस्तत्वमें उपयोग लगाना ।।३००।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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