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________________ समयसार कयमयमात्मा प्रजया गृहीतव्यः ? इति चेत् --- पण्णाए चित्तवो जो चेदा सो अहं तु णिच्छयदो। अवसेसा जे भावा ते मज्झ परेत्ति णायव्वा ॥२६॥ प्रज्ञासे यों गहना, जो चेतक सो हि मैं हु निश्चयसे । अवशिष्ट भाव मुझसे, भिन्न तथा पर पृथक् जानो ॥२६॥ प्रशया गृहीतयो यश्चेतयिता सोऽहं तु निश्चयतः । अवशेषा ये भावाः ते मम परा इति ज्ञातव्याः ॥२६७।।। यो दि निम्तस्वलानलंबिया या प्रविभक्तश्चेतयिता सोऽयमहं । ये स्वमी अबशिष्टा अन्यस्वलक्षणलक्ष्या व्यवलियमाणा भावाः, ते सर्वेऽपि चेतायतृत्वस्य व्यापकस्य व्यायस्वमनायांतोऽत्यंत मत्तो भिन्नाः । ततोऽहमेव मर्यव मह्यमेव मत्त एव मय्येव मामेव गृणामि । यत्किल गृह्णामि तच्चेतनकक्रियत्वादात्मनश्चेतये एव, चेतयमान एव चेतये, चेतयमानेनैव नामसंज्ञ-- पण्णा, चित्तव्य, ज, चेदा, त, अम्ह, तु, णिच्छयदो, अवसेस, ज, भाव, त. अम्ह, पर, इत्ति, णायन्व। धातसंज्ञ-गिव्ह गहणे, चेत करणाववोधनयोः, जाण अवबोधने । प्रातिपदिक-प्रज्ञा, हुएसे ही चौता हूं, चेतते हुएके लिये ही चेतता हूं, चेतते हुएसे ही चेतता हूं, चेतते हुए में हो चेतता हूं, चेतते हुएको ही चेतता हूं अथवा न तो चेतता हूं, न चेतता हुमा चेतता हूं, न चेतते हुएरे चेतता हूं, न चेतते हुएके लिये चेतता हूं, न चेतते हुएसे चेतता हूं, न चेतते हुएमें चेतता हूं, न चेतते हुएको चेतता हूं । किन्तु मैं तो सर्प विशुद्ध चिन्मात्र भाव हूं। भावार्थ:पहिले प्रज्ञाके द्वारा आत्माको बन्धसे भिन्न किया था तब उसीसे यह चैतन्यस्वरूप आत्मा मैं हूं ऐसा अपनेको ग्रहण किया । सो यहाँ अभिन्न छह कारकोंसे ग्रहण किया कि मैं, मुझको, • मेरे द्वारा, मेरे लिये, मुझसे अपनेमें जानता हूं अब और सामान्यकी और वृत्ति हुई सो उससे मै चेतता हूं, अपनेको चेतता हूं, अपने द्वारा चेतता हूं, अपने लिये चेतता हूं, अपनेसे चेतता हूं, अपनेमें चेतता हूं यों अनुभवा । फिर और सामान्य हुए तो इन अभिन्न कारकोंके भेदका भी निषेध करके मैं शुद्ध चैतन्य मात्र भाव हूं, एक अभेद हूं, इस तरह बुद्धिके द्वारा प्रात्माको ग्रहण करना । अब इस अर्थको काव्यमें कहते हैं-भित्त्या इत्यादि । प्रर्थ--जो कुछ भी भेदा जा सकता है उस सरको निज लक्षणके बलसे' भेदकर चैतन्य चिह्नसे चिह्नित, विभागरहित महिमा वाला मैं शुद्ध चैतन्य ही हूं । यदि प्रतिबोधनार्थ कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपा. दान, प्रधिकरण-~ये छ: कारक और सत्व, प्रसत्व, नित्यत्व, अनित्यत्व प्रादिक धर्म व ज्ञान, दर्शन आदिक गुण ये भेदरूप हों तो हों, परन्तु विशुद्ध , समस्त विभावोंसे रहित, शुद्ध, ल
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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