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समयसार किमय मेव मोक्षहेतुः ? इति चेत् --
बंधाणं च सहावं वियाणियो अपणो सहावं च । बंधेसु जो विरजदि सो कम्मविमोक्खणं कुणई ॥२६॥ विधि बन्ध स्वभावोंको, अरु प्रात्मस्वभावको भी जो।
बन्धविरक्त हमा बुध, सो कर्मविमोक्षको करता ॥२६३॥ वन्धानां न स्त्रमा विरल बा । बन्धेषु यो विरज्यते स कर्मविमोक्षणं करोति ।।२६३||
य एव निर्विकारचैतन्यचमत्कारमात्रमात्मस्वभावं तद्विकारकारक बन्धानां च स्वभाव विज्ञाय बंधेभ्यो विरमति स एव सकलकर्ममोक्ष कुर्यात् । एतेनात्मबंधयोद्विधाकरणस्य मोशहेतुत्वं नियम्यते ॥ २६३ ।।
नामसंज्ञ--बन्ध, च, सहाव, अप्प, सहाव, च, बन्ध, ज, त, कम्मविमोक्खण । धातुसंज-वि जाण अवयोधने, वि रज्ज रागे, कुण करणे । प्रातिपदिक-बन्ध, च, स्वभाव, आत्मन्, स्वभाव, च, बन्ध, यत्, तन्, कर्मविमोक्षण । मूलधातु--वि शा अवबोधने, वि रज्ज रागे दिवादि. डुकृन करणे। पदविवरणबन्धाण बन्धानां-षष्ठी बहु० । च-अव्यय । सहावं स्वभाव-द्वितीया एक । विमाणिओ विज्ञाय-असमा. प्तिको क्रिया । अप्पणो आत्मन:-षष्ठी एक० । सहावं स्वभाव-द्विल एक । बन्धेसु बन्धेषु-सप्तमी बहु० । जो यः-प्रथमा एक० ! विरज्जदि विरज्यते-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन किया। सो स:-प्रथमा एकवचन । कम्मविमोक्खणं कर्मविमोक्षण-द्वितीया एकवचन । कुणइ करोति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन क्रिया ।। २६३ ।।
प्रसंगविवरण-अनंतरपूर्व गाथामें बताया गया था कि बन्धको छेद करके जीय मोक्ष प्राप्त करता है । अब इस गाथामें उसी मोक्षके उपायको स्पष्ट बताया है।
तथ्यप्रकाश-(१) बंधका छेदन बंधसे विरक्त होने याने विमुख होनेसे होता है। (२) बंधसे विरक्ति बन्धका स्वभाव ब प्रात्माका स्वभाव जाननेसे होती है । (३) प्रात्मस्वभाव है निर्विकार चैतन्यचमत्कारमात्र । (४) बन्धका स्वभाव है आत्मामें विकार करना । (५) बन्ध स्वभावसे प्रात्मस्वभाव अलग है। (६) अात्मस्वभाव में विकार नहीं। (७) बन्धोंसे ओ हट जाता है वह कर्ममोक्षको प्राप्त होता है।
सिद्धान्त--(१) बन्धसे विरक्ति होनेसे, स्वभाव में मग्नता होनेसे मोक्ष प्राप्त होता है। दृष्टि-- १- शुद्धभावनापेक्ष शुद्ध द्रव्यापिकनय (२४ब) ।
प्रयोग - शुद्धात्मलाभके लिये भात्मस्वभाव व बन्धस्वभावको जानकर बन्धसे विरक्त होकर शुद्धात्मतत्त्वकी भावना करना ।। २६३ ।।
प्रश्न---आत्मा और बंध ये दोनों किस उपायसे पृथक किये जाते हैं ? उसर-- [जीवः च बंधः] जीव और बन्ध ये दोनों [नियताभ्यो] निश्चित [स्वलक्षणाभ्यां] अपने