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________________ ૪ कस्तहि मोक्षहेतुः ? इति चेत्- समयसार जह बंधे छित्तराय बंधणबद्धो तु उ पावड़ विमोक्खं । तह बंधे वित्तृण य जीवो संपावड़ विमोक्खं ॥ २६२ ॥ ज्यों बन्ध काट करके बन्धनबद्ध नर मुक्तिको पाता । J त्यों बन्ध काट करके, आत्मा भी मोक्षको पाता ॥२६२॥ यथा वन्वामित्वा च बन्धनस्तु प्राप्नोति विमोक्षं । तथा बन्धारित्वा च जीवः संप्राप्नोति विमोक्षं । कर्मबद्धस्य बंधच्छेदो मोक्षहेतु:, हेतुत्वात् निगडादिवद्धस्य बंधच्छेदवत् । एतेन उभये नामसंज्ञ --जह, बन्ध, य, बन्धणबद्ध, उ, विमोवख तह, बन्ध, य, जीब, विमोक्ख । धातुसंज्ञ-frage छेदने, आव प्राप्ती संप आव प्राप्तौ । प्रातिपदिक- यथा बन्ध, च बन्धनवद्ध, तु. विमोक्ष, तथा वन्ध, च, जीव, विमोक्ष मूलघातु-छिदिर धोकर प्र आलू व्याप्तो संप्र आलू व्याप्ती । मानते हैं, उनको उपदेश है कि शुभपरिणामसे मोक्ष नहीं होता । प्रसंग विवरण — ग्रनन्तरपूर्व गाथात्रिक में बताया था कि कर्मबन्धरचना के ज्ञानमात्रसे मोक्ष नहीं है । ग्रव इस गाथामें बताया है कि कर्मबन्धविषयक चिन्तासे भी मोक्ष नहीं है तथ्यप्रकाश - ( १ ) कर्मको प्रकृति श्रादिके बन्धका चिन्तवन करने मात्र से मोक्ष नहीं है । (२) कर्मसे रागसे कैसे छूटू इतने मात्र धर्म्यध्यान से भी मोक्ष नहीं है । ( ३ ) सहज चिदानन्दैकस्वरूप अन्तस्तस्वके ध्यानसे रहित जीवके कर्मबन्धचिन्तवनरूप सरागधर्मध्यान से पुण्यबंध तो हो लेगा, मोक्ष नहीं । सिद्धान्त - ( १ ) सरागधर्म्यध्यान शुभकर्मबन्धका हेतु है । दृष्टि - १- निमित्तदृष्टि, उपाधिसापेक्ष अशुद्ध द्रव्याधिकनय ( ५३, ५३ ) । प्रयोग -- कर्मबन्धविनाश चिन्तनसे गुजरकर निर्विकल्प सहजात्मसंवेदन में उपयोगको रमाना ।। २६१ ।। प्रश्न- यदि बन्धके स्वरूपके ज्ञानसे भी मोक्ष नहीं होता और उसको चिन्ता करनेसे भी मोक्ष नहीं होता तो मोक्षका कारण क्या है ? उत्तर- [ यथा च ] जैसे [ बंधन बद्धः ] बन्धनसे बँधा पुरुष [ बंधान् छित्वा तु] बन्धको छेदकर हो [दिमोक्षं] मोक्षको [प्राप्नोति ] प्राप्त करता है [ तथा च] उसी प्रकार [ बंधान छत्वा ] कर्मके बन्धनको छेदकर [जीव: ] जीव [विमोक्षं प्राप्नोति ] मोक्षको प्राप्त करता है । तात्पर्य - - बन्ध के विनाशसे ही मुक्तिको प्राप्ति होती है । टीकार्थ- कर्मपुरुष के बन्धनको छेदन करना मोक्षका कारण है, ऐसा ही हेतुपना
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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