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________________ - - समयसार बंधस्वरूपमा नोक्षहेतुरतुवात गाविद्धस्थ बंधस्वरूपज्ञानमात्रवत् । एतेन कर्मबंध. प्रपंचरचनापरिज्ञानमात्रसंतुष्टा उत्थाप्यते ॥ २८८.२६० ।। पदविवरण- जह यथा-अव्यय । णाम नाम-अव्यय या प्रथमा एक० । को क:-प्रथमा एक० । वि अपिअव्यय । पुग्गिो पुरुष:-प्रथमा एक० | बंधणयम्हि बन्धनके--सप्तमी एक० । चिरकालपडिबद्धो चिरकालप्रतिबद्धः-प्रथमा एकः । तिव्वं तीव्र-द्वितीया एक० । मंदसहावं मंदस्वभाव-द्वि० ए० । काल-द्वि० एक. । च-अव्यय । बियाणये विजानाति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन । तरस तस्य-पष्ठी एक० । यदि जइअव्यय । ण दिन अपि-अव्यय । कुणइ करोति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० । छेद-द्वि० एक० 1 नअव्यय । मुच्चए मुच्यते-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन भाबकर्मवाच्य क्रिया। तेण तेन-तृतीया एक०। । बंधणवसो बन्धनवशः प्रथम एक० । संसन-प्र० 1 | कालेण कालेन-तुल एक० । उत-अव्यय। बहाण बहकेन-तृ० एक० । वि अपि-अव्यय । ण न-अध्यय । सो स:-प्र. एक० । णो नरः-प्र० एक० । पावर प्राप्नोति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन । विमोवखं विमोक्ष-ढि० एक ० । श्य इति वि अपि एवंणन च एव जइ यदि-अव्यय । कम्मबंधणाणं कर्मबन्धयाना-षष्ठी बहु० । पएसठिइपडि प्रदेशस्थिति प्रकृतिद्वि० एकः । अनुभाग-द्वि० ए० ! जाणती जानन्-प्र० ए० । मुच्चइ मुच्यते-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक.. भाधकर्मवाच्य क्रिया । सो सः-प्र० ए० । सुद्रो शुद्धः-प्रथमा एकवचन ।। २८५-२६०॥ मात्र हो कर्मबन्धसे टूटनेका कारण नहीं है । इस कथनसे जो लोग कर्मके बन्धके विस्तारको रचनाके जानने मात्रसे हो मोक्ष मानते हैं, अतः उसके ज्ञानमात्रमें ही सन्तुष्ट हैं उनका खंडन किया है । भावार्य--- जाननेमात्रसे ही बन्ध नहीं कटता, बन्ध तो कटनेसे ही कटता है। प्रसंगविवरण--भूयत्थेरणाभिगया इत्यादि अधिकार गाथाके अनुसार जीव, अजीव, पुण्य, पाप, प्रास्रव, संवर, निर्जरा व बन्ध तत्त्वका वर्णन अब तक हो चुका । अब क्रमप्राप्त मोक्षतत्वका वर्णन किया जाता है । तथ्यप्रकाश-(१) प्रात्मा और कर्मबन्धके अलग-अलग हो जानेको मोक्ष कहते हैं । (२) कर्म व कर्मबन्धके स्वरूपका ज्ञान भर कर लेना मोक्षका कारण नहीं । (३) कर्मबन्धके विस्तार व रचनाके ज्ञानमात्रसे ही सन्तुष्ट होनेमें कल्याण नहीं है । (४) कर्मबन्धको अलग हटा देना मोक्षका हेतु है । (५) मिथ्यात्व रागादिरहित होकर अनन्तज्ञानादिगुणात्मक परमास्मस्वरूपमें स्थित होता हना ही जीव कर्मबन्धोंको छोड़ देता है। (६) स्वरूपोपलब्धिरहित पुरुषोंको कर्मबन्ध रचनादि परिज्ञानसे व चर्चासे मन्दकषायके कारण मात्र पुण्यबन्ध होता है, मोक्षमार्ग नहीं। सिद्धान्त-(१) सहज स्वशुद्धज्ञानमय अन्तस्तत्वको प्राराधना होनेपर कर्मबन्धसे मुक्ति होतो है। दृष्टि—१- शुद्धभावनापेक्ष शुद्ध द्रव्याथिकनय (२४ब) ।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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