SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 542
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ४६१ बन्धाधिकार प्रसरमपरः कोऽपि नास्यावृणोति ॥१७६।। इति बंधो निष्क्रांतः ॥ २८६-२८७ ।। इति श्रीमदमृतचंद्रसूरिविरचितायां समयसारव्याख्यायामात्मख्याती बंधप्ररूपक: सप्तमोऽङ्क ।। ७ ।। एक । जं यत्-प्रथमा एक० । णिच्चं नित्यं-प्रथमा एक० । अचेयणं अचेतन-प्रथमा एकवचन। उत्तं उक्तप्रथमा एकवचन ॥२८६-२८७ ।। -..--- -- - -.नवकोटिविशुद्ध मुनिके कर्मबन्ध नहीं है । दृष्टि-१- निमित्तदृष्टि (२२)। २- शुरुभावनापेक्ष शुद्ध द्रव्याथिकनय (२४ब) । प्रयोग-परद्रव्य मुझमें राग नहीं करता, स्वभावतः प्रात्मा राग नहीं करता, किन्तु परद्रव्यविषयक रागादिविकल्प मुझे परतन्त्र बनाता यह जानकर रागादिविकल्पको छोड़कर अविकल्प सहज शुद्ध ज्ञानानन्दस्वभाव में उपयोग लगाना ।।२८६-२८७ ।। इति श्रीमत्कुन्दकुन्दाचार्यविरचित समयसार व उसकी श्रीमदमृतचंद्रसूरिविरचित समयसारख्याख्या प्रात्मख्यातिकी सहजानन्दसमदशाङ्गी टोकामें बन्धप्ररूपक सातवां अंक समाप्त हुमा ।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy