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________________ पूर्व रंग सजातीय विजातीय परद्रव्योंसे भिन्न, परद्रव्यके गुणपर्यायोंसे भिन्न तथा परद्रव्यके निमित्तसे हुए अपने विकारोंसे कथंचित् भिन्न एकाकार ऐसा जो प्रात्मा उसके तत्वको देखती है अर्थात अवलोकन करती है । यहाँ सरस्वतीको मूर्तिको आशीर्वचनरूप नमस्कार किया है । जो लोकमें सरस्वतीकी मुति प्रसिद्ध है, लोकको प्रायः उसका भाव विदित नहीं है, इसलिये उसका यथार्थ वर्णन किया है । जो सम्यग्ज्ञान है, वह सरस्वतीको सत्यार्थ मूर्ति है । उसमें भी सम्पूर्ण ज्ञान तो केवलज्ञान है जिसमें सब पदार्थ प्रत्यक्ष प्रतिभासित होते हैं, वही अनन्त धर्मोसहित मात्मतत्त्वको प्रत्यक्ष देखता है और उसीके अनुसार श्रुतज्ञान है, वह परोक्ष देखता है, इसलिये यह भी उसीकी मूर्ति है तथा द्रव्यश्रुत वचनरूप है सो यह भी उसीको मूर्ति है, क्योंकि वचनों द्वारा अनेक धर्म वाले प्रात्माको यह बतलाती है । इस तरह सब पदार्थोके तत्त्वको जताने वाली जाए तथा बनना अनेकांतमयो सरस्वतीको मूर्ति है । इसी कारण सरस्वतीके नाम वाणी, भारती, शारदा, वाग्देवी आदि बहुतसे कहे जाते हैं । यह अनन्त धर्मोको स्यात्पदसे एक धर्मी में अविरोधरूप साधती है, इसलिये सत्यार्थ है। आत्माका जो अनन्तधर्मा विशेषण दिया है, उसमें अनन्त धर्म कौन-कौन हैं ? वस्तुमें सत्त्व, वस्तुत्व, प्रमेयत्व प्रदे शवत्व, चेत. नत्व, अचेतनत्व, मूर्तिमत्त्व, अमूर्तिमत्त्व इत्यादि धर्म तो गुण हैं और उन गुगोंका तीनों कालोंमें समय समयवती परिणमन होना पर्याय हैं, वे अनन्त है तथा एकत्व, अनेकत्व, नित्यत्व, अनित्यत्व, भिन्नत्व, अभिन्नत्व, शुद्धत्व, अशुद्धत्व प्रादि अनेक धर्म हैं, वे सामान्यरूप तो बचनगोचर हैं और विशेषरूप बचनके अविषय हैं, ऐसे वे अनन्त हैं सो ज्ञानगम्य हैं । ऐसा होनेपर प्रात्मा भी वस्तु है, उसमें भी अपने धर्म अनन्त हैं । उसमें से चेतनत्व असाधारण है, यह दूसरे अचेतनद्रव्यमें नहीं है और सजातीय जीवद्रव्य अनन्त हैं, उनमें भी चेतनत्व है तो भी निजस्वरूपसे जुदा-जुदा मत् हैं। क्योंकि प्रत्येक द्रव्यके प्रदेश भिन्न-भिन्न हैं, इसलिए किसीका प्रदेश किसी में नहीं मिलता । यह चेतनत्व अपने अनन्तधर्मों में व्यापक है, इस कारण इसीको आत्माका तत्त्व कहा है । उसको यह सरस्वतीको मूर्ति देखती है और दिखाती है। इसलिये इस सरस्वतीको आशीर्वादरूप वचन कहा है-यह सदा प्रकाशरूप रहे । इसीसे सब प्राणियोंका कल्धारण होता है। प्रसंगविवरण-समयसार तक पहुच हो, एतदर्थ समयसारका, स्त्रका अध्यका यावश्यक है । समयसारका व समस्त तत्वोंका परिज्ञान श्रुत (पागम) के अध्ययनसे होता है । वह श्रुतदेवता अनेकान्तमयी मूर्ति है उसके नित्य प्रकट प्रकाशमान होनेकी भावना इस कारण की गई है कि अनेकान्तात्मक शास्त्रोपदेश जिन जीवोंको उपलब्ध होगा वे अपना कल्याण कर सकेंगे । तथ्यप्रकाश----(१) सर्व परवस्तुवोंसे भिन्न, नैमित्तिक परभावोंसे भिन्न व अपने ही
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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