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________________ वन्धाधिकार ४६७ श्रित्याविशेषात् । प्रतिषेध्य एवं चाय, पारमाश्रितनिश्चयन याश्रितानामेव मुच्यमानत्वात्, परा. श्रितव्यवहारनयस्यकातनामुच्यनानेनामधेन प्याजीयनाणत्वाच्च ।। २७२ ।। आज्ञार्थं लोट् मध्यम पुरुष एक प्रिया । णिच्छयणायेण निश्चयनयेन-तृतीया एक.। णिच्छयणयासिदा नियनयाश्रिता:-प्रथमा बहु० । पुण पुनः--अव्यय । मुणिणो मुनयः-प्रथमा बहु० । पावंति प्राप्नुवंतिवर्तमान लट् अन्य पुरुष बहु० क्रिया। णिब्याणं निर्वाणम्-द्वितीया एकवचन ।। २७२ ॥ के हो आश्रय प्रवत रहे हैं वे कर्मसे कभी नहीं छूटते । प्रसंगविवरण--अनन्तरपूर्व गाथामें मध्यवसानका अनेक नामोंसे परिचय कराते हुए प्रध्यवसान छुड़ानेका अथवा अध्ययसान छुड़ानेके लिये अन्याय समस्त व्यवहार ही छुड़ानेका संकेत दिया था 1 अब इस माथामें निश्चयनयको उपयोगिता दिखाकर व्यवहारनय प्रतिषिद्ध किया गया है। तथ्यप्रकाश-(१) यहाँ परद्रब्धका प्राश्रयकर होने वाला विकल्प व्यवहारनय है । (२) यहाँ शुद्धात्मद्रव्यका प्राश्रयकर होने वाला सद्भाव निश्चयनय है । (३) निश्चयनय प्रर्थात् शुद्धात्मद्रव्यका प्राश्रय करने वाले मुनि निर्वाणको प्राप्त करते हैं। (४) निश्चयनयके द्वारा अर्थात् शुद्धात्म द्रव्यके प्राश्रय द्वारा परद्रव्याश्रित समस्त व्यवहार प्रतिषिद्ध हुमा है। (५) पराश्रित व्यवहारन यके प्राश्रयसे साक्षात् निर्वाण नहीं है । सिद्धान्त--- (१) परद्रव्यविषयक व्यवहार अथवा अध्यवसान सब उपचार होनेसे मिथ्या है । (२) सहजसिद्धशुद्धात्मद्रव्यविषयक उपयोग स्वसहजभाव होनेसे भूतार्थ है। दृष्टि-- १- अनेक प्रसद्भूतव्यवहार (१२४, १२५, १२६, १२७, १२८ आदि)। २- परमशुद्धनिश्चयनय (४४)। प्रयोग-निश्चयचारित्रको उपयोगितामें ही ध्यान लगाकर परमविश्राम पाना ।।९७२।। प्रश्न--प्रभव्य जीव व्यवहारनयका कैसे प्राश्रय करता है ? उत्तर--[जिनवरैः] जिनेश्वरदेव के द्वारा प्राप्तं] कहे गये [व्रतसमितिगुप्तयः] व्रत समिति गुप्ति [शीलतपः] शील तपको [कुर्वन्नपि] करता हुआ भी {अभव्यः] अभव्य जीव [अज्ञानी मिथ्याष्टिः तु] अज्ञानी मिथ्या दृष्टि ही है। तात्पर्य-निज अविकार सहज ज्ञानस्वभावका अनुभवन हो पानेसे व्रतादिको पालता हमा भी प्रभव्य अशानी है। टोकार्य-शील तपसे परिपूर्ण तीन गुप्ति पांच समितिसे संयुक्त, अहिंसादिक पाँच महावत रूप व्यवहारचारित्रको प्रभव्य भी करे तो भी यह प्रभव्य चारित्रसे रहित, प्रज्ञानी,
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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