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________________ ४५२ समयसार वस्तु प्राश्रयभूतं । न हि बाह्यवस्स्वनाश्रित्य अध्यवसानमात्मानं लभते । यदि बाहायस्त्वना श्रित्यापि अध्यवसानं जायेत तदा यथा वीरसूभुतस्याश्रयभूतस्य सद्भावे वीरसूसूनुं हिनस्मीत्य । ध्यवसायो जायते, तथा बंध्यासुतस्याश्रयभूतस्यासद्भावेऽपि बंध्यासुतं हिनस्मीत्यध्यवसायो च, यस्तुतः, तु, बन्ध, अध्यवसान, बन्ध । मूलधातु-प्रति इण गती, भू सत्ताया, अस् भुवि । पदविवरण- । वत्थं वस्त-द्वितीया एकवचन । पडच्च प्रतीत्य-असमाप्तिकी क्रिया। जंयत-प्रथमा एक० । पूण पून:-- अव्यय । अज्झवसाणं अध्यवसानं--प्रथमा एक० । दुतु-अव्यय । होदि भवति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष, एकवचन किया । जीवाणं जीवानां-षष्ठी बहु ! ण य न च--अव्यय । वत्थुदो वस्तुत:-पंचम्यर्थे अव्यय । क्योंकि कारणके प्रतिषेधसे ही कार्यका प्रतिषेध होता है। देखिये--बंधहेतु अध्यबसानको हेतु.। पना होनेपर भी बाह्य वस्तु बंधका हेतु नहीं है, क्योंकि जैसे कोई मुनीन्द्र ईर्यासमितिरूप । प्रवत रहा है उसके चरणसे हना गया जो कालका प्रेरा प्रतिवेगसे शीघ्र पाकर पड़ा कोई उड़ता हुमा जीव मर गया, तो भी उसके मर जानेसे मुनीश्वरको हिंसा नहीं लगती सो बंधके कारणभूत अध्यवसायके कारणभूत बाह्यवस्तुको बन्धकारणता न होनेसे बाह्य वस्तुको बंधका कारणपना मानने में अनेकांतिक हेत्वाभासपना पाता है । अतः जीवका प्रतद्भावरूप बाह्य वस्तु । बंधका कारण नहीं है । जीवका तद्भावस्वरूप अध्यवसान हो बंधका कारण है । भावार्थ:-नियनपसे या हेतु मध्यषसान ही है । बाह्य वस्तुएं अध्यवसान के प्राश्रयभूत हैं, उनमें उपयोग देनेसे अध्यवसान व्यक्त होता है, इस कारण बाह्य बस्तु उपचारसे अध्यवसानका कारण कहा जाता है । बाह्य वस्तुके बिना निराश्रय यह अध्यवसान नहीं होता । इस कारण बाह्य बस्तुका त्याग कराया गया है । यदि बन्धका कारण बाह्य वस्तु हो । कहा जावे तो कोई मुनि ईयाँसमितिसे यत्न कर गमन करता हो उस समय उसके पैरोंके । नीचे कोई उड़ता जीव प्रा पड़ा और मर गया तो उसकी हिंसा मुनीश्वरको क्यों नहीं लगती? } सो यहाँ बाह्य दृष्टिसे देखा जाय तो हिसा हुई, परन्तु मुनिके हिंसाका अध्यवसान नहीं है, इसलिए वह जीवका मरणरूप परधात बंधका कारण नहीं है । हाँ बाह्य वस्तुके बिना निरा. श्रय अध्यवसाय प्रकट नहीं होता, इसलिये बाह्यवस्तुका निषेध करना उपदेशमें बताया है। प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्व गाथामें बताया गया था कि अबताध्यवसाय पापबन्धका हेतु है और बताध्यवसाय पुण्यबंधका हेतु है । अब इसीके समर्थन व अन्ययोगव्यवच्छेदके लिये इस गाथाका अवतार हुमा है । तथ्यप्रकाश--(१) अध्यवसाय ही कर्मबन्धका निमित्त है । (२) पंचडान्द्रयके विष. भूत चेतन अचेतन बाह्य पदार्थ कर्मबन्धका निमित्त नहीं है । (३) बाह्य पदार्थ तो कर्मब
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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