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________________ ४४८ समयसार एवं हि हिंसाध्यवसाय एवं हिसेत्यायातं अभवसिदेण बंधो सत्ते मारेउ मा वा मारेउ । एसो बंधसमासो जीवाणं णिच्छयणयस्स ॥२६२॥ अध्यवासितसे बन्धन, प्राणी मारो तया नहीं मारो। निश्चयनयके मतमें, जीवोंका बन्ध विवरण यह ॥२६२।। अध्यवसितेन बंधः सत्त्वान् मारयतु मा वा मारयतु । एष बंधसमासो जीवानां निश्चयनयस्य ॥२६२।। परजीवानां स्वकर्मोदयवैचिश्यबशेन प्राणव्यपरोपः कदाचिद् भवतु, कदाचिन्मा भवतु । य एव हिनस्मोत्यहंकाररसनिर्भरो हिंसायामध्यवसायः स एव निश्चयतस्तस्य बंधहेतुः निश्चयेन परभावस्य प्राणव्यपरोपस्य परेण कतु मशक्यत्वात् ।।२६२॥ नामसंज-अन्भवसिद, सतना ज न त, जीव, णिच्छयणय । धातुसंज-मर प्राणत्यागे । प्रातिपदिक-अध्यबसित, बन्ध, सत्व, मा, वा, एतत, बन्धसभास, जीव, निश्चयनय । मत्र प्राणत्यागे । पदविवरण-अज्झवसिदेण अध्यवसितेन-तृतीया एक० । बंधो बन्धः-प्रथमा एकवचन । सत्ते सत्त्वान्-द्वि० बहु० । मारेउ मारयतु-लोट् आशाद्यर्थे अन्य पुरुष एकवचन णित क्रिया। एसो एषः-प्रथमा एक० । जीवाणं जीवानां-षष्ठी बहु । णिच्छयणयस्स निश्चयनयस्य--षष्ठी एकवचन ॥२६॥ प्रसंगविवरण-अनन्सरपूर्व माथाद्वयमें अध्यवसायको बन्धहेतु बताया गया था। अब यह बताया जायगा कि प्रध्यवसाय ही पाप व 'पुण्य है । जिनमें से प्रथम हो इस गाथामें बताया है हिंसाविषयक अध्यवसाय ही हिंसा है। तथ्यप्रकाश---१-जीवोंका प्राणवियोग उनके कर्मोदयकी विचित्रताके वश होता है । २-जो जीव अन्य जीवके प्रति "इसे मारू" ऐसा अध्यवसाय करता है उसे हिंसाका पाप लग ही गया, चाहे वह जीव मरे या न मरे । ३-हिंसाविषयक अध्यवसाय (अभिप्राय) ही निश्चयसे उसके बंधका कारण है व कर्मबन्धका मूल निमित्त कारण है । ४-निश्चयसे अन्यप्राणदियोगरूप परभाव किसी अन्य जीवके द्वारा किया ही नहीं जा सकता। सिद्धान्त--१--नवीन कर्मबन्धका साक्षात् निमित्त कारण उदयागत द्रभ्यप्रत्यय (कर्म) है । २.-उदयागत द्रव्यप्रत्ययोंमें कर्मबन्धनिमित्तपना प्रावे इसका निमित्त अध्यवसाय है । ३--अध्यवसाय करनेसे आत्मा खुद ही अपनी विकृतियोंसे बुरा बँधा हुआ है । . दृष्टि-१--निमित्तदृष्टि (५३ अ)। २-निमित्तस्थानिमित्तदृष्टि (२१)। ३--अशुद्धनिश्चयनय (४७)। प्रयोग---अपने अध्यवसायसे हो बंध होता है, ऐसा जानकर रागादिक अपध्यान छोड़
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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