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________________ -. - - -- बन्धाधिकार जो मण्णदि हिंसामि य हिंमिज्जामि य परेहि सत्तेहिं । मो मूढो अगाणी गाणी एत्तो दु विवरीदो ॥२७॥ ___ मैं पर जीवोंसे घत, जाता परको व घातता हूँ मैं । यो माने अज्ञानी, इससे विपरीत है ज्ञानी ॥२४७॥ यो मन्यते हिनरिम न दिये च परैः सत्वः । स मूढोऽज्ञानी ज्ञान्यतस्तु विपरीत: ॥२४७११ परजीवानहं हिनस्मि परजीवैहिस्य चाहमित्यध्यवसायो ध्र वमज्ञानं स तु यस्यास्ति सोऽज्ञानिवास्मिथ्याष्टिः । यस्य तु नास्ति स ज्ञामित्वात्सम्यग्दृष्टि: ।।२४७।। नामसंज्ञ ज, पर, सत्त, न, मुह, अण्णाणि, णाणि, एत्तो, दु वितरीद । धातसंज्ञ मन्न अवबोधने, हिंस हिसायां । प्रातिपदिक यत्, च, पर, सत्त्व, तस्, मुह, अज्ञानिन्, शानिन्, अतः, तु, विपरीत । मूलपातु-- मन ज्ञाने, हिसि हिसायां रुधादि । पदविवरण-जो य:-प्रथमा एकवचन । मगणदि मन्यते वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन । हिंसामि हिनस्मि-वर्तमान लद अन्य पुरुष एक० । य च-अध्यय । हिमिज्जामि हिस्य-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक कर्मवाच्य क्रिया । परेहि परैः, सत्तेहि सत्वैः-तृतीया बहु० । सो सःप्र० ए० । मूढो मूढः-प्र० ए० । अण्णाणी अज्ञानी-प्रथमा एक० । णाणी ज्ञानी-प्र० एक० । एतो अत:अव्यय । दु तु-अव्यय । विवरीदो विपरीत:-प्रथमा एकवचन ॥ २४७ ।। प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्वको पहिली । व बादकी ५ गायावोंसे यह स्पष्ट कर दिया गया था कि उपयोग में रागादि करनेसे अर्थात् प्रज्ञानमय अध्यवसाय करनेसे वन्ध होता है । प्रब इस गाथामें उसी मज्ञानमय अध्यवसायके उदाहरणमें बताया गया है कि हिमाका प्रध्यवसान अज्ञानमय भाव है। तथ्यप्रकाश- (१) मैं दूसरे जोवको घातता हूं, ऐसा अध्यवसाय निश्चित प्रज्ञान है । (२) मैं दूसरे जीवोंके द्वारा घाता जाता हूं, ऐसा अध्यवसाय भो निश्चित प्रज्ञान है । (३) सम्यग्दृष्टिके अज्ञानभाव नहीं होता । सिद्धान्त-(१) कर्मबन्धका निमित्त कारण जीवका अध्यवसाय है। (२) जीव प्रज्ञान से अपने में अपने कष्ट के लिये अपनी प्रज्ञानपरिणतिसे मिथ्या अध्यवसाय करता रहता है । दृष्टि---१- उपाधिसापेक्ष अशुद्ध द्रव्याथिकनय व निमित्तदृष्टि (२४, ५३)।प्रशुद्धनिश्चयन (४७)। प्रयोग-बन्धके कारणभूत अपने प्रज्ञानमय अध्यवसायको भेदविजानसे दूर करना पौर झानमात्र अपने स्वरूपमें उपयोगको लगाना ।। २४७ ।। प्रश्न- यह अध्यवसान क्यों प्रज्ञान है ? उत्तर- [जीवानां] जीवोंका [मरण] मरण [प्रायुःक्षयेण] आयुकर्मके क्षयसे होता है ऐसा [जिनवरः] जिनेश्वर देवोंने [प्राप्त]
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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