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________________ -- -- समयसार तद्भवनापूर्व स. विनश्यति कस्तं वेदयते ? यदि वेदकभावपृष्ठभावी भावोत्यस्तं वेदयते तदा तद्धवनात्पूर्व स वेद्यो विनश्यति । किं स वेक्ष्यते ? इति कोक्ष्यमाणभाववेदनानवस्था। तां च उभय, अपि, न, कदा, अपि । मूलघात - विद चेतनाख्याननिवासेषु चुरादि, वि-णश अदर्शने दिवादि, कां क्षि कांक्षायां स्वादि । पदविवरण-जो यः-प्रथमा एकवचन । वेददि वेदयते-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० क्रिया। वेदिज्जदि वेद्यते-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन कर्मवाच्य क्रिया । समए समए समये समयेसप्तमी एक० । विणस्सदे विनश्यति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन क्रिया । उहयं उभयं-प्रथमा एक० । हैं वे विभावभावोंके उत्पाद तथा विनाशस्वरूप होनेके कारण क्षणिक हैं । वहाँ जो वेदकभाव आगामी चाहा जाने योग्य बेद्यभावको अनुभव करता सो वह वेदकभाव जब तक बने तब तक वेद्यभाव नष्ट हो जाता है। उसके नष्ट होनेपर बेदकभाव किसका अनुभव करे ? यदि वह वेदकनाव कोक्ष्यमार पंचसापक बाद होने वा अन्य वेद्य भावको बेदन करता है तो उसके होनेसे पहले ही वह बेदकभाव नष्ट हो जाता है सब उस वेद्यभावको कौन देद सकता है ? यदि वेदकभावके बाद होने वाला अन्य वेदकभाव उस वेद्यभावको बेदेगा तो उस वेदकभावके होनेके पहले वह वेधभाव नष्ट हो गया तब वह वेदकभाव कौनसे भावको वेदे ? ऐसा कांक्षमाणभाव अर्थात वेदनेको दाछा में प्राने योग्य भावके वेदनेको अनवस्था है कहीं ठहराव ही नहीं हो पायगा । अतः उस अनावस्थाको जानता हुमा जानी कुछ भी इच्छा नहीं करता। भावार्थ-वेदकभाव और वेद्यभाव इन दोनों में काल भेद है याने जब वेदकभाव होता है तब वेद्यभाव नहीं और जब वेद्यभाव होता है तब वेदकमाव नष्ट हो जाता है । इसलिये ज्ञानी दोनोंको विनाशीक जानकर तथा वेद्यभाव कभी बेदा ही नहीं जा सकता यह जानकर आप जानने वाला ही रहता है । अब इसी अर्थका स्पष्टीकरण करनेके लिये कलशरूप काव्य कहते हैं—वेद्य इत्यादि । अर्थ-वेद्यवेदकभावके चलायमान होनेसे याने समय समयमें नष्ट होते रहनेसे वाछितभाव वेदा ही नहीं जाता। इस कारण झानी कुछ भी प्रागामी भोगोंकी वांछा नहीं करता और सभीसे वैराग्यको प्राप्त होता है । मावार्थ-वैद्यवेदक विभावके कालभेद है इसलिये उन दोनों भावोंके योगको विधि मिलती नहीं सब उपभोगको वांछा शानों क्यों करेगा। प्रसंगबिबरण---अनन्तरपूर्व गाथामें बताया गया था कि ज्ञानी भावी उपभोगको नहीं चाहता है । अब इस गाथामें उसका कारण बताया गया कि ज्ञानी आगामी उपभोगको क्यों नहीं चाहता है ?. तथ्यप्रकाश-(१) सुख दुःखादिको भोगने वाला रागादिविकल्प वेदकभाव है।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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