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समयसार अथैवमयमशेषभावांतरपरिग्रहशून्यत्वादुद्वतिसमस्साशानः सर्वत्राप्यत्यंतनिरालंबो भूत्वा प्रतिनियतटकोकोकज्ञायकभावः सन् साक्षाद्विशानधनमात्मानमनुभवति ॥ पूर्वबद्धनिजकर्मविपाका. ज्ज्ञानिनो यदि भवत्युपभोगः । तद्भवस्वथ प रागवियोगान्नूनमेति न परिग्रहभाव ।।१४६॥ ।। २१४ ।। सर्व, भाव, च, न, शानिन्, ज्ञायकभाव, नियत, निरालम्ब, तु, सर्वत्र । मूलधातु--इषु इच्छाया तुदादि । पदविवरण--एवं-अव्यय । आदिए आदिकान-द्वितीया बह० । दु तु--अश्यय । विविहे विविधान्-द्वितीया बहु० । सब्बे सर्वान्-द्वितीया बहु०। यम-अव्यय । ण न-अव्यय । इच्छदे इच्छति-वर्तमान लट् अन्य घुरुष एकवचन क्रिया। णाणी ज्ञानी-प्रथमा एक० । जाणगभावो शायकभाव:-प्रथमा एक० । मियदो। नियत:-प्र० ए० । णीरालंबो निरालम्बः-प्रथमा एक० । दुतु-अध्यय । सब्वस्थ सर्वत्र-अव्यय ॥ २१४ ।। कर्मविपाकसे झानीके यदि उपभोग होता है तो होगो । अब यहाँ रागका वियोग होनेसे निश्चयसे वह उपभोग परिग्रह भावको प्राप्त नहीं होता। भावार्थ---पूर्वबद्ध कर्मोका विपाको. दय होनेपर उपभोगसामग्री प्राप्त होती है सो वहाँ प्रज्ञानी तो उसे अज्ञानमय रागभावसे भोगता . है, अतः प्रजानीके उपभोगका परिग्रह है, किन्तु शानी प्रशानमय राग न होनेसे वह उपभोगता हुप्रा भी परिग्रही नहीं, किन्तु शायक है ।
प्रसंगविवरण-- अनंतरपूर्व ४ गाथाघों में बताया गया था कि ज्ञानी जीव धर्म (पुण्य), अधर्म (पाप), प्रशन व पानको नहीं चाहता है, अतः ज्ञानीके उनका परिग्रह नहीं । अब इस गाथामें उसी कथनका उपसंहार करते हुए कहा है कि ऐसे ही जो और परभाव हैं उन सबको भी ज्ञानी नहीं चाहता है वह सर्वत्र निरालम्ब है और मात्र ज्ञायक है ।
तथ्यप्रकाश-(१) पुण्य पाप भोजन पानको न चाहनेकी भांति ज्ञानी विषयकवाय प्रादिक सभी परभावोंको नहीं चाहता है। (२) परद्रव्यभावोंको न चाहनेसे ज्ञानीके उनका परिग्रह नहीं है। (३) ज्ञानीके मात्र ज्ञानमय भाव बर्तनेसे अन्य किसीको स्वीकार नहीं करता है, अत: वह निष्परिग्रह है। (४) ज्ञानो समस्त परभावपरिग्रहशून्य होनेसे समस्त प्रज्ञानका वमन कर चुका है । (५) ज्ञानी किसी परभावको स्वीकार न करनेसे समस्त अन्य पदार्थोका पालम्बन सज देता है । (६) शानो सिर्फ जाननहार रहनेसे अपनेको साक्षात विज्ञानधन अनुभवता है।
सिद्धांत--(१) प्रात्मद्रव समस्त पर व परभावोंसे रहित है । (२) ज्ञानी भावान्तरों का शायकमात्र होमेसे सर्व भावान्तरोंके मालम्बनसे रहित है।
हटि-१- शून्पनय (१७३)। २- प्रकर्तृनय (१९०), प्रभोक्तृनय (१९२) ।