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________________ निर्जराधिकार ३८७ उप्पण्णोदयभोगो वियोगबुद्धीए तस्स सो णिच्च । कंखामणामयस्स य उदयस्स ण कुब्बए णाणी ॥२१५॥ वर्तमान भोगोंमें, वियोगमतिसे प्रवृत्ति है जिसकी। भावी भोगोंको बह, ज्ञानी कांक्षा नहीं करता ॥२१॥ उत्पन्नोदयभोगो वियोगबुद्धया तस्य स नित्यं । कांक्षामनागतस्य चोदयस्य न करोति ज्ञानी ॥२१|| कर्मोदयोपभोगस्तावदतीतः प्रत्युत्पन्नोऽनागतो वा स्यात् । तत्रातीतस्तावदतीतत्वादेव स न परिग्रहभावं विति । अनागतस्तु प्राकांक्ष्यमाण एव परिग्रहभाव विभृयात् । प्रत्युत्पन्नस्तु मामसंश-उप्पण्णोदयभोग, विओगबुद्धि, त, त, णिच्चं, कंखा, अणागय, च, उदय, ण, णापि । पासुसंझ-कंख वांछाया, कुश्य करणे। प्रातिपदिक-उत्पश्नोदयभोग, वियोगबुद्धि, तत्, तत्, नित्यं, कांक्षा, अनागत, च, उदय, ण, णाणि । मूलधातु-कांक्षि कांक्षायो भ्वादि, उतु अय गती, डुकृत्र करणे । पवविवरण-उप्पण्णोदयभोगो उत्पन्नोदयभोग:-प्रथमा एक० । विओगबुद्धीए वियोगबुद्धधा-तृतीया एक० । प्रयोग-निराकुल रहने के लिये समस्त भावान्तरोंका पालम्बन सजना और मात्र सबका जाननहार रहना ।। २१४ ।।। अब झानीके तीनों काल विषयक परिग्रह नहीं है ऐसा बताते हैं--[उत्पन्नोदय भोगः] वर्तमान कालमें उत्पन्न हुमा उदयका भोग लक्ष्य र मानो नि] हमेगा नियोगसुध्या] वियोगको बुद्धिसे प्रवर्तता है [च] पौर [अनागतस्य उदयस्य] अागामो कालमें होने वाले उदयको [सः बह [ज्ञानी] ज्ञानी [कांक्षां] इच्छों [न करोति नहीं करता इस कारण ज्ञानीके त्रिकालविषयक उपभोगका भी परिग्रह नहीं है। तात्पर्य--ज्ञानीके उपभोगमें आस्था नहीं, किन्तु अरतिभाव है इस कारण ज्ञानीके किसी भी पर व परभावका परिग्रह नहीं है। टीकार्थ---कर्मोदयका उपभोग अतीत, वर्तमान और प्रागामी कालविषयक होता है। उनमेंसे प्रतीत कालका तो उपभोग बीत चुकनेके कारण वह परिग्रह भावको धारण नहीं करता और अनागत कालका उपभोग प्राकक्ष्यिमाण हुमा ही परिग्रहभावको धारण करेगा, तथा वर्तमानका उपभोग रागबुद्धिसे प्रवर्तमान होता हुधा ही परिग्रहभावको धारण करेगा, किन्तु ज्ञानीके वर्तमानका उपभोग रागबुद्धिसे प्रवर्तमान नहीं दिखता, क्योंकि शानीके प्रज्ञानमयभावरूप रागबुद्धिका प्रभाव है । केवल वियोगबुद्धिसे ही प्रवर्तमान होता हा वह उपभोग निश्चयसे परिबह नहीं है । इस कारण वर्तमान कामके उपयका उपभोग शानो परिग्रह नहीं होता और अनामो कर्मके उपयका उपभोग इ मा होता ही नहीं है क्योंकि ज्ञानीके
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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