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________________ ३८२ समयसार अपरिग्गहो feat भागदो गाणी यच्छिदे असणं । परिग्गहो दु असणस जागो तेा सो होदि ॥ २१२ ॥ निर्वाञ्छक अपरिग्रह कहा है ज्ञानी न चाहता भुक्ति इससे भुक्तिपरिग्रहविरहित ज्ञायक पुरुष होता ॥ २१२ ॥ अपरिग्रहोऽनिच्छो भणितो ज्ञानी च नेच्छति अशनं । अपरिग्रहस्त्वशनस्य ज्ञायकस्तेन स भवति ।। २१ । इच्छा परिग्रहः । तस्य परिग्रहो नास्ति यस्येच्छा नास्ति । इच्छा त्वज्ञानमयो भावः । अज्ञानमयो भावस्तु ज्ञानिनो नास्ति । ज्ञानिनो ज्ञानमय एव भावोस्ति । ततो ज्ञानी प्रज्ञानमयस्य नामसंज्ञ -- अपरिग्गह, अणिच्छ, भणिद, णाणि, य, ण, असण, अपरिग्मह, दु, असण, जाणग, त त । धातुसंज्ञ भण कथने, इच्छ इच्छायां अस भक्षणक्षेपणयो:, जाण अवबोधने, हो सत्तायां । प्राति पदिक अपरिग्रह, अनिच्छ, भणित, ज्ञानिन् च, न, अशन, अपरिग्रह, तु, अशन, ज्ञायक, तत् तत् । मूलधातु — नत्र - परिग्रह उपादाने क्यादि, इषु इच्छायां तुदादि, भण शब्दार्थः, अश भोजने यादि, ज्ञा २ - ज्ञानमय एक ज्ञायकभाव दृष्टिमें होनेसे ज्ञानी ज्ञायक ही रहता है । दृष्टि - १ -प्रतिषेधक शुद्धनय (४६) । २ - शुद्ध नय ( १६८ ) । ; प्रयोग - पापविपाकरस भी उपयोग में झलके तब भी उसे परप्रतिफलन जानकर उससे उपेक्षा कर अपने निष्पाप ज्ञानस्वरूपमें ही उपयुक्त होनेका पौरुष करना ||२११ ।। श्र ज्ञानके भोजनका परिग्रह नहीं है यह बताते हैं [ अनिच्छः ] इच्छारहित पुरुष [ अपरिग्रहः] अपरिग्रहो [भशितः] कहा गया है [च] और [ज्ञानी] ज्ञानी [प्रशनं . ]... भोजनको [न] नहीं [ इच्छसि ] चाहता है । [तेन ] इस कारण [ स ] वह [ अशनस्य ] भोजन का [ अपरिग्रहः] परिग्रही नहीं है [तु] किन्तु वह [ज्ञायकः ] भोजनका ज्ञायक ही [ भवति ] होता है । तात्पर्य - साताके उदयवश क्षुधा होनेपर भी क्षुधा रोगको इच्छा न होनेसे क्षुषा रोगकी प्रौषधिभूत भोजन की कामना न होनेसे ज्ञानीके भोजनका परिग्रह नहीं है । टोकार्थ- -इच्छा परिग्रह है। उसके परिग्रह नहीं है, जिसके इच्छा नहीं है । इच्छा तो प्रज्ञानमय भाव है । अज्ञानमय भाव ज्ञानीके नहीं होता । ज्ञानीके ज्ञानमय हो भाव होता है । इस कारण ज्ञानी श्रज्ञानमय भावरूप इच्छाका प्रभाव होनेसे भोजनको नहीं चाहता है, मतः ज्ञानीके प्रशन (भोजन) का परिग्रह नहीं है, किन्तु मात्र ज्ञानमय एक ज्ञायक भावके होनेसे प्रशन (भोजन) का केवल शायक ही होता है । भावार्थ-ज्ञानीके न क्षुवा रोगको इच्छा है और न श्रास्थामें क्षुधाकी चिकित्साकी इच्छा है अतः ज्ञानी प्रशनका अपरिग्रही है ।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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