SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 43
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ४ . २६३ गाथा सं० विषय प्रारम्भ पृष्ठ संग १४७-१५० दाभाशम दोनों कर्मोले राग व संसर्ग छोइनेका उपदेश व कर्मोंसे राग संसर्ग करनेसे हानिका उदाहरणपूर्वक निरूपण १५१ शानही मोक्षका कारण है इसकी सिद्धि ૨૭૬ १५२ से १५३ अज्ञान-पूर्वक विए गए बत नियम, शील और तप से मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती। २८१ १५४ परमार्थसे बाह्य जीव अशानसे नोलका हेतुन जानते हए संसारके हेतुभूत पुण्यको मोक्षहेतु समझकर पुण्य कमो में आसक्त रहते हैं। २५४ १५५ जीबादि पदार्थोंका श्रद्धान, उनका अधिगम और रागादिकका परिहार, इस रत्नन्नयभात्र की मोक्ष-मार्ग रूपताका वर्णन २८६ १५६ परमार्थरूप मोक्षके कारणसे भिन्न अन्य काँका निवेध । १५७ से १५९ · कर्म मोक्षके कारणका घात करता है उसका दृष्टान्तपूर्वक निरूपण १६० कर्म में स्वयं बचपनेकी सिद्धि १६१ से १६३ मिथ्यात्व, अज्ञान और कषाय सम्प्रदर्शन-जान-चरित्न के प्रतिपक्षी हैं । २६८ ५-आस्रवाधिकार १६४ से १६५ मिथ्यात्व, अविरति, योग और कषाय जीव अजीव के भेद से दो प्रकार के हैं। उन दोनों में परस्पर निमित्तनैमित्तिक भाव होनेसे आसवकी उपपत्ति १६६ शानी के पात्रवोंका अभाव और पूर्णनिबद्ध कर्मोका जाननपना १६५ राग-द्वेषमोहरूप श्रज्ञानमय परिणामोंके ही यात्रवपनेका नियमन ३०५ १६८ जीवके रागादिसे असंकीर्ण भावको संभवताका कथन १६६ ज्ञानीके ध्यानवोंके अभावका निरूपण ३०० १७० जानी किस प्रकार मिरास्त्राव होता है. ऐसी जिज्ञासाका समाधान ३१० १७१ से १७६ अज्ञानी और ज्ञानीके आस्वकी संभवता व असंभवता का क्लिपूर्वक वर्णन १७७ से १८० राग-द्वेष-मोह अज्ञान परिणाम ही स्त्रव है, वह ज्ञानीके नहीं है। अतः ज्ञानीके कर्म बन्ध भी नहीं है। ६-संवर अधिकार १८१ से १८३ संवरके मूल उपायभूत भेदविज्ञानका निरूपण ३२७ १८४ से १८५ भेदविज्ञानसे ही शुद्ध आत्माको प्राप्ति होती है, उसका उदाहरणपूर्वक वर्णन ३३२ १८६ शुद्ध आत्माको जानने से शुद्धात्माकी प्राप्ति है और अशुद्ध जानने से अहात्मा की प्राप्ति है, शदात्माकी प्राप्ति संबर है १८७ से १९२ संबर किस प्रकार से होता है इसका अनुक्रमिक वर्णन ७-निर्जरा अधिकार १९३' द्रव्य निर्जराका स्वरूप व व्यनिर्जराका कारण ३४४ १६४ भावनिर्जराका स्वरूप व भावनिर्जशका परमार्थ आधार १९५ पुत् गलकोदयका उपभोग होनेपर कर्मसेन बंधनेका आधार ज्ञानसामध्य ३४६ १९६ विषयोपभोग होनेपर भी कर्मसे न बंधनेका आधार तीन वैराग्य सामर्थ्य ३५० १९७ ज्ञान व वैराग्यके सामथ्र्यका दृष्टान्तपूर्वक स्पष्टीकरण ३५२
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy