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________________ गाथा सं0 विषय प्रारम्भ पृष्ठ सं. ८५ से १६ आमाको गुदगलकमका का-भोक्तः माननेगर अात्मा पुदगला अभिनत्मक। प्रमंद आएगा, जोकि जिनदेवका मत नहीं है। अन स्व व पदगलकमें दोनों आत्मा करता है ऐसा मानने वाला भी मिपा दष्टि है। ८७ से ८ मिथ्यास्थादि आसव,जीव अजीब के भेद से दो-दो प्रकार के है ऐसा निकम और उसका हेनमे समर्थन । ८६ से १२ अनादिश उपाधिसंयोगवश आत्मा. मिथ्यात्य, अशान और अविरनिय तीन परिणाम होने चले आ रहे हैं । जब इन सीन प्रकार के परिणामकारतय होता है, तब पदगाल द्रव्य स्वयं वमरूप परिणमित होता है। १३ गरमें आत्मत्वका विकसन करने मे आत्म। कर्मका कर्जा नहीं होना । ६४ से ६५ अज्ञानसे कम किस प्रकार उत्पन्न होता है? अमका निरूपण ६ अज्ञानवश जीव रको व आत्माको एक मानता है। १७ शाम होने पर यह जीव समस्त कलत्व विकल्पको छोड देता है। २०२ १८ से ११ व्यवहारमे जीनको पुदगल वर्मका कर्ता कहते हैं. किन्तु निश्चयनः जीवको पूगलकमका कर्ता मानने में दोष है उसका निराण । १०० आत्मा निमित-नमिभिवा भावसे भी पदगल मना कर्ज नहीं है । जीवका मात्र योग-उपयोग निमिन-मैमित्तिक भावसे कम है। योग उपयोगका जीनपर्ला । १०१ जो आत्माको पर.का अकर्ता जानता है वह शानी है १० से १०४ अज्ञानी भी परद्रव्य के भावका कर्ता नहीं है मान अपने शुभाशुभ भाव का कर्ता है; इसका सयक्तिक स्पष्टीकरण १०५ से १०५ जीवके निमित्तमान होने पर फर्मका परिण मन देखकर उपचारसे कहा जाता है कि वह बाई जीवने किया । उसका उदाहरण पूर्वक पंथन । २१८ १०६ से ११२ मिथ्यात्वादि गामान्य आसन और उसके विशेष रूप तेरा गुणस्थान ये अंधके को हैं। निश्चय से जीव कमेंका कर्ता नही है। २२४ ११३ से ११५ जोव और प्रत्ययों (आस्रवों में एकरने नहीं है ! दोनों भिन्न-भिन्न हैं इसक: विवरण ११६ से १२५ सांस्यानुयायी लोग पुरुष और प्रकृतिको अरिणामी मानते है, उसका निपंध्र करके पुरुष और पुदगलको परिणामी सिद्ध करनेका निरूपण १३६ से १३१ ज्ञानसे ज्ञानमय भाव और अज्ञानसे अज्ञानमय भाव ही उत्पन्न होता है। हग की उदाहरणपूर्वक मिद्धि २३८ १३२ से १३६ अज्ञारी जीवके द्रव्यकर्मांध में निमिसरूप होने वाले अजानादि भावोंवा हेनत्व । १३ मे १४० पक्ष्गल और जीव दोनोंके परिणाम एक दुसरे से पृथक हैं। इसका वर्णन २५० १४१ हम जावमय दर्म जीव में बद्धस्पष्ट है अथवा अपदस्पष्ट ? इसका नविभागस समाधान १४२ से १४८ जयपक्षों से रहित आत्मा का कमभाव से रहित समयसार अर्थात व्यतः युद्ध आत्मा है। ४-पुण्य-पाप अधिकार १४५ शुभाशुभ कर्म दोनों ही प्रा-माके लिये अहित. २१ मा निर्देश । १४६ गभाशुभ दोनों ही नाच अविशेषतारो कर्मबन्ध के कारण है। २१३ २२८
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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