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________________ निर्जराधिकार ३७५ अतोहमपि न तत् परिगृह्णामि मझ परिग्गहो जइ तदो अहमजीवदं तु गच्छेज । णादेव अहं जमा तमा ण परिग्गहो मज्झ ॥२०॥ अन्य पारग्रह मेरा, यदि हो मुझमें अजोधपन होगा। ज्ञाता हो मैं इससे, कोई परिग्रह नहीं मेरा ॥२०॥ मम परिग्रहो यदि ततोऽहमजीवतां तु गच्छेयं । ज्ञातवाहं यस्मात्तस्मान्न परिग्रहो मम ।। २०८ ॥ ___ यदि परद्रध्यमजीवमहं परिगृह्णीयां तदावश्यमेवाजोवो ममासौ स्व: स्यात् । प्रहमप्यवध्यमेवाजीवस्यामुष्य स्वामी स्यां । अजीवस्य तु यः स्वामी, स किलीजीव एव । एवमबशेनापि नामसंज्ञ-अम्ह, परिग्गह, जइ, तदो, अम्ह, अजीवद, तु, णादा, एव, अम्ह, ज, त, ण, परिग्गह, अम्ह । धातुसंज्ञ---गच्छ गतो, परि ग्गह ग्रहणे । प्रातिपदिक-अस्मद, परिग्रह, यदि, ततः, अस्मद्, अजीवता, तु, ज्ञातृ, एव, अस्मद्, यत्, तत्, न, परिग्रह, अस्मद् । मूलधातु-गम्ल' गतौ, परि-गृह ग्रहणे । परबिवरण- मम मज्झ-षष्ठी एक० । परिगहो परिग्रहः-प्रश्रमा एकवचन । बई यदि-अव्यय । तदो तत:जाए तो जीव अजीवपनेको प्राप्त हो जाय यह आपत्ति प्रावेगी। अतः परमार्थसे जीवके अजीवका परिग्रह मानना मिथ्याबुद्धि है । ज्ञानीके मिथ्याबुद्धि नहीं होती। ज्ञानीकी दृढ़ प्रास्था है कि परद्रव्य मेरा परिग्रह नहीं है, मैं तो मात्र ज्ञाता हूं। प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्व गाथामें बताया गया था कि शानी परद्रव्यको क्यों नहीं ग्रहण करता । इसका कारण जानकर अब इस गाथामें कहा है कि इस कारण मैं भी परद्रव्य को ग्रहण नहीं करता। तथ्यप्रकाश--(१) पदार्थ मात्र अपने स्वरूपको ही ग्रहण करता है । (२) यदि मैं प्रचेतन परद्रव्यको ग्रहण कर लूं तो वह परद्रव्य मेरा स्व बन जायगा और मैं भी उस अचे. तन परद्रव्यका स्वामी बन बैठूगा यह दोष आता है। (३) चूंकि अचेतनका स्वामी अचेतन ही होता है और मैं बन बैठा अचेतन परद्रव्यका स्वामी तो मैं भी अचेतन हो जाऊँगा यह दोष आता है । (४) अन्य जीव भी मेरा स्व नहीं है, क्योंकि अन्य जीव मेरा स्व हो जाय तो मैं अन्यरूप हो जाऊंगा मेरी सत्ता न रहेगी यह दोष माता है । (५) मैं अचेतन परद्रव्य हो ही नहीं सकता, क्योंकि एक ज्ञायकभाव ही मेरा है, इस ज्ञायकभावका मैं स्वामी हैं। (६) मैं. अन्य जीवरूप हो ही नहीं सकता, क्योंकि मैं निज चैतन्यस्वरूपास्तित्वसे सन्मय हूं, मन्य जीव अपने अपने चैतन्यस्वरूपास्तित्वसे तन्मय हैं । (७) चूंकि मैं ज्ञाता हो रहता हूं अन्य द्रव्यरूप नहीं होला,. इस कारण मैं किसी भी परद्रव्यको नहीं ग्रहण करता।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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