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________________ ३७४ समयसार तत्त्वदृष्ट्यवष्टंभाद् श्रात्मानमात्मनः परिग्रहं तु नियमेन विजानाति । ततो न ममेदं स्वं नाह मस्य स्वामी इति परद्रव्यं न परिगृह्णाति ॥ २०७॥ षष्ठी एक । इमं इदं प्र० ए० । हवदि भवति - वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० क्रिया । दव्वं द्रव्यं-प्रथमा एक० । अप्पानं आत्मानं द्वितीया एक० । अप्पणी आत्मनः षष्ठी एक० । परिग्गहं परिग्रह - द्वितीया एकबचन । तु अव्यय | वियदं नियतं - अव्यय यथा स्यात्तथा । विद्याणतो विजानन्- प्रथमा एकवचन ॥२०७॥ उसका स्व है और वही उस स्वका स्वामी है । ( २ ) स्व व स्वामित्वका प्रभेदपरिचय होनेसे आनी अपना परिग्रह अपने आपको ही जानता है । ( ३ ) शानोका परद्रव्यके बारेमें भी अपने प्रयोगके लिये दृढ़ निर्णय है कि यह (परद्रव्य) मेरा स्व नहीं है और न मैं इसका (परद्रव्यका ) स्वामी | ( ४ ) अपने स्वरूपको ही अपना सर्वस्व माननेके कारण ज्ञानी जीव परद्रव्यको ग्रहण नहीं करता । सिद्धान्त --- १- परद्रव्यका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव मुझमें होना असम्भव होनेसे परद्रव्य मेरा कुछ नहीं है । २- श्रात्माका सर्वस्व यह स्वयं श्रात्मा है । दृष्टि - १ - प्रतिषेधक शुद्धमय ( ४९८ ) । २- उपादानदृष्टि ( ४९ ब ) ! प्रयोग - दुःखके हेतुभूत भ्रमभावको दूर करनेके लिये परद्रव्यको अपने से भिन्न निरखना व अपने आपके सर्वस्वभूत ज्ञानमात्र भावको ही उपयोग में लेना ।। २०७ ।। इस कारण मैं भी परद्रव्यका ग्रहण नहीं करता हूं - [य] यदि [ परिग्रहः] परिग्रह [म] मेरा हो [ततः ] तो [ श्रहं ] मैं [ प्रजीवतां] प्रजीवपनेको [ गच्छेयं ] प्राप्त हो जाऊँगा [तु यस्मात्] तो चूंकि [श्रहं] मैं [ज्ञाता एवं ] ज्ञाता ही हूं [तस्माद् ] इस कारण [ परिग्रहः ] कुछ भी परिग्रह [ सम] मेरा [न] नहीं है । तात्पर्य - मैं वह हूं जो मेरेसे तन्मय है । बाह्य परिग्रह मेरेसे अत्यन्त भिन्न है, अतः स्वस्वरूपातिरिक्त कुछ भी मेरा नहीं है । टीकार्थ -- यदि मैं अजीव परद्रव्यको ग्रहण करू तो यह अजीव मेरा स्व अवश्य हो जाय और मैं भी उस श्रजीवका अवश्य स्वामी ठहरू । परन्तु प्रजीवका जो स्वामी है वह निश्चयसे प्रजीव हो होता है इस तरह मेरे विवशपतेसे अजीपना था पड़ेगा । किन्तु मेरा तो एक ज्ञायकभाव ही स्व है, उसीका मैं स्वामी हूं, इस कारण मेरे अजोवपना मत होश्रो, मैं तो ज्ञाता ही होऊंगा परद्रव्यको नहीं ग्रहण करूंगा यह मेरा निश्चय है । भावार्थ -- वस्तुतः जीव में तन्मय तो जीवस्वरूप ही है उसीसे जीवका स्वस्थामोसम्बंध है । और प्रजीवके स्वरूपके साथ प्रजीवका स्वस्वामीसम्बन्ध है । इस कारण यदि अजीव परिग्रह जीवका माना 1 8
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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