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________________ समयसार स्यात् । एतेन द्रव्यनिर्जरास्वरूपमावेदितं ॥१६३॥ बहु । जं यत्-द्वितीया एकवचन । कुदि करोति-वर्तमान लट् अन्य पुरुप एक क्रिया । सम्मदिट्ठी सम्यदृष्टि:-प्रथमा एकवचन कर्ताकारक । तं तत्-प्रथमा एकवचन । सव्वं सर्व-प्रथमा एक० ! णिज्ज रणिमित्तं निर्जरानिमित्त-प्रथमा एकवचन ।। १६३ ।।। २-नवीन कर्मबन्धका कारण न बनकर उदयागत द्रव्यप्रत्ययका निकल जाना द्रव्यनिर्जरा है । ३-उपभोगमें राग होनेसे मिथ्यादृष्टिका उपभोग कर्मबंधका निमित्त होता है । ५-निर्जरा होना व बन्धका न होना गुणस्थान के अनुसार समझना । ४--मिथ्या दृष्टिके निर्जरा गजस्नान वत् बंध कराती हुई होती है। सिद्धान्त-१-- उदयामत द्रव्यप्रत्ययके निमित्तसे चेतन प्रचेतन द्रव्योंका उपभोग होता है । २- समस्त परभावसे विरक्त होनेसे झानीके कर्मनिर्जरण होता है । ३- अज्ञानीके रागादिभाव होने के कारण कर्मबन्ध होता है । दृष्टि-- १- उपाधिसापेक्ष प्रशुद्धद्रव्याथिकनय (२४) । २- शुद्धभावनापेक्ष शुद्धद्रव्याथिकनय (२४८) । उपाधिसापेक्ष अशुद्ध द्रव्याथिकनय (२४)। प्रयोग-~-बन्धहेतुभूत रागादिसे दूर होनेके लिये निज सहज ज्ञानज्योतिमें उपयोगको स्थिर करनेका पौरुष करना ॥१६३।। अञ्च भावनिर्जराका स्वरूप कहते हैं-[द्रव्ये उपभुज्यमाने] द्रव्यकर्मके व वस्तुके भोगे जानेपर [सुखं वा दुःखं] सुख अथवा दुःख [नियमात्] नियमसे [जायते] उत्पन्न होता है। [था] और [जवीरवं] उदय में आये हुए [तत् सुखदुःखं] उस सुख दुःखको [वेदयते] अनुभव करता है [प्रथ] फिर वह सुख दुःखरूप भाव [निर्जरां याति] निर्जराको प्राप्त होता है । तात्पर्य-ज्ञानीके सुख दुःख पाता है, किन्तु उसमें लगाव न होनेसे वह भाव मागे को बंधनका कारण न बनकर निर्जीर्ण हो जाता है। टोकार्थ-परद्रव्यके भोगनेमें मानेपर. तन्निमित्तक सुखरूप प्रथवा दुःखरूप भाव नियमसे उदय होते हैं, क्योंकि वह वेदना साता तथा असाता इन दोनों भावोंका अतिक्रमण नहीं करती। सो यह सुख दुःखरूप भाव जिस समय अनुभवा जाता है उस समय मिथ्यादृष्टि के तो रागादिभावोंके होनेसे आगामी कर्मबन्धका निमित्त होकर झड़ता हुना भी निर्जरारूप नहीं होना हुआ बन्ध हो कहना चाहिये । और सम्यग्दृष्टिके उस सुख दुःखके अनुभवसे रागादि भाबोंका प्रभाव होनेसे प्रोगामी बधका निमित्त न होनेसे केवल निर्जरा रूप ही होता है सो निर्जरारूप हुप्रा निर्जरा ही कहना चाहिये, बन्ध नहीं कहा जा सकता । भावार्थ--द्रव्यकर्मको
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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