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समयमा
अथ निर्जराधिकार
अथ प्रविशति निर्जरारागाद्यास्रवरोधतो निजधुरां धृत्वा परः संवरः कर्मागामि समस्तमेव भरतो दूराग्निरुधन स्थितः । प्रारबद्धं तु तदेव दग्धुमधुना व्याजम्भते निर्जरा ज्ञानज्योतिरपावृतं न हि यतो रागादिभिर्मछति ।
उवभोगमिदियेहिं दवाणमचेदणाणमिदतणं । जं कुणदि सम्मदिट्ठी तं सब्बं णिजरणिमित्तं ॥१६॥
उपभोग इन्द्रियोंके, द्वारा चेतन अचेतनोंके जो।
करता सम्यादृष्टी, बह सब है निर्जरा हेतु ॥१६३॥ उपभोगमिद्रियैः द्रव्याणामचेतनानामितरेषां । यत्करोति सम्यग्दृष्टि: तत्सर्वं निर्जरानिमित्तं ।।१६।।
विरागस्योपभोगो निर्जराये एव । य एव रागादिभावानां सद्भावेन मिथ्यादृष्टे रचेतना
नामसंज-उवभोग, इंदिय, दव्व, अचेदण, इदर, ज, सम्मदिदि, त, सव्व, णिज्जरणिमित्त । धातुसंज-इव प्राप्तौ, कुण करणे, जर बयोहानी झरणे च । प्रातिपदिक - उपभोग, इन्द्रिय, द्रव्य, अचेतन,
अब निर्जरा प्रवेश करती है-रागाद्या इत्यादि । अर्थ-रागादिक प्रास्रवोंके रोकने से अपनी सामर्थ्य द्वारा आगामी सब हो कर्मोको मूलमें दूर ही से रोकता हुना परमसंबर ठहर रहा था, अब इस संवरके होने के पहले बँधे हुए कमौको जलानेके लिये निर्जरारूप अग्नि फैलती है जिससे कि ज्ञानज्योति निरावरण होती हुई फिर रागादिभावोंसे भूछित नहीं होती।
भावार्थ-संवर होनेपर नवीन कर्म तो बँधते नहीं और जो पहले बँधे हुए थे वे झड़ रहे, तब ज्ञानका प्रावरण दूर होनेसे ज्ञान ऐसा विशुद्ध हो जाता है कि फिर वह ज्ञान रागा. दिरूप नहीं परिणमता, सदैव विशुद्ध प्रकाशरूप ही रहता है ।
अब निर्जराका स्वरूप कहते हैं-[सम्यग्दृष्टिः] सम्यग्दृष्टि जीव [यत्] जो [इंद्रियः] इंद्रियोंसे [अचेतनानां] अचेतन और [इलरेषां] अन्य चेतन [प्रध्यारणां] द्रव्योंका [उपभोगं] उपभोग [करोति] करता है [तत् सवं] वह सब [निर्जरानिमित्तं] निर्जराका निमित्त है।
तात्पर्य-कर्मोदयरूप निर्जरगके समय प्राप्त उपभोगके प्राश्रय हुए रागमें राग न होने के कारण ज्ञानोके संसारनिमित्तक कर्मबन्ध न होनेसे वह उपभोग निर्जराका हो निमित्त