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________________ ३३७ संराधिकार छापरिहारेण समस्त संगविमुक्तो भूत्वा नित्यमेवातिनिष्प्रकंपः सन् मनागपि कर्मनोकमणोरसंस्पर्शन आत्मीयमात्मानमेवात्मना ध्यायन् स्वयं सहजचेतयितृत्वादेकत्वमेव चेतयते स खल्वेकवचेतनेनात्यंतविविक्तं चैतन्यचमत्कार मात्र मात्मानं ध्यायन् शुद्धदर्शनज्ञानमयमात्मद्रव्यमवाप्तः शुद्धात्मोपलभे सति समस्त परद्रव्यमयत्वमतिक्रांतः सन् अचिरेणैव सकलकर्म विमुक्तमात्मानमएव त कम्मदविमुक्त | धातुसंज्ञ-रुध रोधने, ट्ठा गतिनिवृत्ती, ज्भा ध्याने, चेत स्मृत्यां, लभ प्राप्ती । प्रातिपदिक - आत्मन् द्विपुण्यपापयोग दर्शनज्ञान, स्थित इच्छाविरत, च, अन्य यत् सर्व संगमुक्त, कमन् नोकर्मन् चेतयितृ एकत्व, ध्यायत्, दर्शनज्ञानमय, अनन्यमय, अचिर, कर्मप्रविमुक्त: मूलधातु -- रुधिर आवरणे ष्ठा गतिनिवृत्तौ ध्यं चिन्तायां चिति संज्ञाने स्वादि, चित संचेतने चुरादि, डुलभय् प्राप्ती । ग्रन्य वस्तुमें इच्छारहित [च] और [सर्वसंगमुक्तः ] सब परिग्रहसे रहित हुप्रा [आत्मना ] ग्रात्मा द्वारा [आत्मानं ] श्रात्माको [ ध्यायति] ध्याता है तथा [कर्म नोकर्स] कर्म नोकर्मको [न अपि ] नहीं ध्याता और आप [ चेतयिता ] तनहार होता हुआ [ एकत्वं ] एकत्वको [[चितयति ] विचारता है [स] वह जीव [ श्रनन्यमयः ] श्रनन्यमय होकर [ आत्मानं ध्यायन् ] आत्माका ध्यान करता हुआ [ श्रचिरेण ] थोड़े समय में [ एव] ही [ कर्मप्रविमुक्तं ] कर्मरहित [ श्रात्मानं ] आत्माको [ लभते] प्राप्त करता है । तात्पर्य - श्रात्माका श्रात्मामें एकाग्र ध्यान करने वाला पुरुष प्रत्पकालमें कर्मरहित हो जाता है । टोकार्थ - राग द्वेष मोहरूप मूल बाले शुभाशुभ योगों में प्रवर्तमान अपने श्रात्माको जो जीव हट्लर भेदविज्ञानके बलसे आपसे ही प्रत्यन्त रोककर शुद्ध ज्ञानदर्शनात्मक श्रात्मद्रव्य में अच्छी तरह ठहराकर समस्त परद्रव्योंकी इच्छा के परिहारसे समस्तसंगरहित होकर नित्य ही निश्चल हुआ किचिन्मात्र भी कर्मको नहीं स्पर्श करके अपने श्रात्माको आत्माके द्वारा हो ध्याता हुआ स्वयं चेतने वाला होनेसे श्रपने चेतनारूप एकत्वको ही अनुभवता है वह जीव निश्चयसे एकत्वको चेतने से परद्रव्यसे प्रत्यन्त भिन्न चैतन्य चमत्कारमात्र अपने भात्माको ध्याता हुआ, शुद्ध दर्शनज्ञानमय प्रात्मद्रव्यको प्राप्त हुआ शुद्धात्माका उपलम्भ होने पर समस्त परद्रव्यमयता से प्रतिक्रान्त होता हुआ अल्प समय में ही सब कर्मोंसे रहित आत्माको प्राप्त करता है । यह संवरका प्रकार है । भावार्थ - जो भव्य जीव रागद्वेषमोहमिश्रित शुभ अशुभ मन, वचन, कायके योगों से अपने आत्माको भेदज्ञानबल से चलित न होने दे, पश्चात् शुद्ध दर्शनज्ञानमय अपने स्वरूप में अपनेको निश्चल करे और फिर समस्त बाह्य श्राभ्यन्तर परिग्रहोंसे रहित होकर कर्म
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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