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________________ ३३२ समयसार कथं भेदविज्ञानादेव शुद्धात्मोपलंभ ? इति चेत् जह कायमग्गितवियं पि कणयहावं ण तं परिच्चयइ । तह कम्मोदयतविदो ण जहदि णाणी उणाणितं ॥१८४॥ एवं जाणइ गाणी अण्णाणी मुणदि रायमेवादं । अण्णाणतमोच्छण्णो श्रादसहावं अयाणंतो ॥१७॥ ज्यौं अग्निता काश्चन,, कांचन परिणामको नहीं तजता । त्यौं कर्मोदयपीडित, जानी भी ज्ञान नहि तजता ॥१८४॥ ज्ञानी सुजानता यों, अज्ञानी रागको हि निज माने । प्रज्ञान प्रध श्रावृत्त, वह आत्मस्वभाव नहि जाने ॥१८५॥ यथा कनकमग्नितप्तमपि कनकभावं न तं परित्यजति । तथा कर्मोदयतातो न जहाति ज्ञानी तु ज्ञानित्वं । एवं जानाति ज्ञानी अज्ञानी जानाति रागमेवात्मानं । अज्ञानतमोऽवच्छन्दः आत्मस्वभाबमजानन् । यतो यस्येव यथोदितं भेदांवज्ञानमस्ति स एव तत्सद्धावाज् ज्ञानी सन्ने जानाति । यथा प्रचंडपावक प्रतसमपि सुवर्ण न सुवर्णत्वमपोहति तथा प्रचंडकर्मविपाकोपष्टन्धमपि ज्ञानं न ज्ञानत्वमपोहति, कारणसहस्रणापि स्वभावस्यापोढुमशक्यत्वात् । तदपोहे तन्मात्रस्य वस्तुन नामसंज्ञ--जह, कणय, अग्गितवियं, पि, कणयहाव, ण, त, तह, कम्मोदयतविद, ण, णाणि, उ, पाणित, एवं, णाणि, अग्णाणि, राय, एव, आद, अण्णाणतसोच्छण, आदसहान, अयाणंत । धातुसंज्ञ. . तव तपने तृतीयगणे, परि-च्चय त्यागे तृतीयगणे, उद-अय गती, जहा त्यागे, जाण अवबोधने, मृण ज्ञाने । प्रातिपदिक-यथा, कानक, अग्नितप्त, अपि, कनकभाव, न, तत्, तथा, कर्मोदयतप्त, न, ज्ञानिन्, तु, ज्ञानित्व, भावार्थ:-प्रात्मस्वभाव व पोषाधिक भावमें भेदविज्ञान होनेसे प्रात्मा जब ज्ञानी होता है तब कर्मके उदयसे संतप्त हुप्रा भी अपने ज्ञानस्वभावसे नहीं चिगता। यदि कोई पदार्थ स्वभावसे घिग जाय तो वस्तुका ही नाश हो जायगा ऐसा न्याय है। इसलिये कर्मके उदयके समय ज्ञानी रागी, द्वेषी, मोही . नहीं होता। और जिसके भेदविज्ञान नहीं है वह अज्ञानी हना रागी, द्वेषी, मोही होता है। इसलिये यह पूर्ण निश्चित है कि भेदविज्ञानसे ही शुद्ध प्रात्माकी प्राप्ति होती है। प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्व गाथायुग्ममें यह निष्कर्ष निकला था कि भेदविज्ञानसे ही शुद्धात्माकी उपलब्धि होती है । सों उसी सम्बन्धमें इस माथायुग्ममें इस जिज्ञासाका समाधान बताया है कि कैसे भेदविज्ञानसे शुद्धात्माकी उपलब्धि होती हैं। तथ्यप्रकाश-५-शानी कर्मविपाकसे पाच्छन्न होकर भी ज्ञानोपनको नहीं छोड़ता ।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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