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________________ प्रास्रवाधिकार ३१३ एवं सति कथं ज्ञानी निरास्त्रवः इति चेत् दंसणणाणचरित्तं जं परिणमदे जहण्णभावेण । णाणी तेण दु बज्झदि पुग्गलकम्मेण विविहेण ॥१७२॥ दर्शन जान पनि जो, परिणाम है बम्बमाधीस । इससे ज्ञानी बंधता, नाना पौदगलिक कर्मोसे ॥१७२॥ दर्शनज्ञानचारित्रं यत्परिणमते जधन्यभावेन । ज्ञानी तेन तु बध्यते पुद्गलकर्मणा विविधेन ।। १७२ ।। यो हि ज्ञानी स बुद्धिपूर्वकरागद्वेषमोहरूपावभावाभावात निरास्रव एव, किंतु सोऽपि यावज्ज्ञानं सर्वोत्कृष्टभावेन द्रष्टुं ज्ञातुमनुचरितुं वाऽशक्तः सन् जघन्यभावेनंव झानं पश्यति जाना नामसंशदसणणाणचरित्त. ज, जहाणभाव, गाणि, त, दु, पुग्गलकम्म, विविह । धातुसंज्ञ-दंस दर्शनायां, जाण अवबोधने, चर गती, परि-णम प्रह्लत्वे, भव सत्तायां, बंध बंधने । प्रातिपदिक दर्शनशानचारित्र, यत्, जघन्यभाव, ज्ञानिन्, तत्, लु, पुद्गलकर्मन, विविह् । मूलधातु-शिर् प्रेक्षणे, ज्ञा अवबोधने, चर गत्यर्थः भ्वादि, बन्ध बन्धने। पदविवरण · दसणणाणचारित्तं दर्शनज्ञानचारित्र-प्रथमा एक० । जं अब पूछते हैं कि यदि ज्ञानगुमाका जघन्य भाव याने अन्यत्वरूप परिणमन कर्मबंधका कारण है तो फिर वह ज्ञानो निरास्त्रव कैसे रहा उसके उत्तरमें गाथा कहते हैं:--[यत्] क्योंकि [दर्शनशानवारित्रं] दर्शनज्ञानचारित्र [जघन्यभावेन] जघन्यभावसे [परिणमते] परिणमन करता है [तेन तु] इस कारणसे [ज्ञानी] ज्ञानो [विविधेन] अनेक प्रकारके [पुस्गलकर्मरण] पुद्गल कर्मसे [बध्यते] बंधता है । तात्पर्य---सराग अवस्थामें दर्शन ज्ञान चारित्रका जघन्य याने निरन्तर न टिक सके ऐसा परिणमन है, इस कारण वहाँ कर्मबन्ध हो जाता है । टीकार्थ----जो वास्तवमें ज्ञानी है वह बुद्धिपूर्वक राग द्वेष मोहरूप प्रास्रवभावके प्रभाव से निरास्रव ही है। किन्तु वह ज्ञानी जब तक ज्ञानको सर्वोत्कृष्ट भावसे देखनेको, जाननेको, प्राचरण करनेको असमर्थ होता हुया जघन्यभावसे हो ज्ञानको देखता है, जानता है, प्राचरण करता है तब तक उस ज्ञानीके भी ज्ञानके जघन्यभावको अन्यथा अनुपपत्ति होनेसे अनुमीयमान अबुद्धिपूर्वक कर्ममलकलंकका सद्भाव होनेसे पुद्गलकर्मका बन्ध होता है । इस कारण तब तक ज्ञानको देखना, जानना और पाचरण करना, जब तक ज्ञानका जितना पूर्ण भाव है उतना देखा, जाना, पाचरण किया अच्छी तरह न हो जाय । उसके बाद साक्षात् ज्ञानो हुआ सर्वथा निरास्रव हो होता है । भावार्थ--ज्ञानीके बुद्धिपूर्वक अज्ञानमय रागद्वेष मोहका प्रभाव है, इसलिये वह निरास्रव है फिर भी जब तक क्षायोपशमिक ज्ञान है, तब तक दर्शन, ज्ञान, चारित्र जघन्यभावसे परिणमते हैं, अतएव सम्पूर्ण ज्ञानका देखना, जानता, पाचरण होना
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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