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________________ ধ্বংসাঘিষ্ঠা भावो जीवभावात्मकृतिपिलष्टः सन्, न पुनर्जीवभावमुपैति । एवं ज्ञानमयो रागाद्यसंकीणों भावः संभवति । भावो रागद्वेषमोहविना यो जीवस्य स्याद् ज्ञाननिर्वृत एव । रुधन सर्वान् द्रव्य कर्मास्रोधान एषोऽभावः सर्वभावालवाणां ।।११४।। ।। १६८॥ एक० । बज्झए बध्यते-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन भाषकर्मप्रक्रिया विया ! पुणो पुनः- यय । विटे वृन्ते-सप्तमी एक० । जीवस्स जीवस्य-बष्ठी ए। कम्मभावे कर्मभावे-सप्तमी एक ण न-अव्यय । पुण पुन:-अव्यय । उदयं-द्वितीया एक० । उवेई उपैति-वर्तमान लट् अन्य पुष्य एकवचन क्रिया ॥१६॥ रहित ज्ञानके द्वारा ही रचा हा जो जीवका भाव है, वह सब द्रव्यानवों को रोकता हुया तभी भावानवोंका प्रभाव स्वरूप है । भावार्थ- ज्ञानमयभाव भावात्रवोंका प्रभावरूप इस कारण है कि संसारका कारण मिथ्यात्व ही है उस सम्बन्धी रामादिकका अभाव हुमा तो सभी भावाखत्रोंका अभाव हो गया समझना । प्रसंगवियरप- अनन्तरपूर्व गाथामें बताया गया था कि रागादिसंकीर्ण भाव बंधक होता है और रागाद्यसंकीर्ण भाव सबंधक होता है । अब यहाँ इस गाथामें उसी रागाद्यसंकीर्ण भाषका सद्भाव बताया गया है । तथ्यप्रकाश-(१) ज्ञानो जीवके सुख-दुःखादि कर्मभावके निर्जी होनेपर वह कर्म रागद्वेषमोहका प्रभाव होनेसे जीवभावको प्राप्त नहीं होता है । (२). जो. कर्मभाव जोवभावको STप्त नहीं होता वह फिर बन्धको भी प्राप्त नहीं होता है । (३) जो बन्धस्प नहीं हो सकता वह उदयको भी प्राप्त नहीं होता । (४) ज्ञानीके भाव रागाद्यसकोणं होनेसे शुद्ध भाव कहलाते हैं । (५) ज्ञानी जीयके शुद्धभाव होनेसे निर्विकार स्वसंवेदनके बलसे संवरपूर्वक निर्जरा होती है । (२) उस प्रकारके कर्मका बन्धक न होकर उदित विभावका व कर्मभावका निकल जाना मोक्षमार्गसंचालक निर्जरा है। सिद्धान्त-(१) अज्ञान अवस्थामें कर्मभावको जीवभाव माननेकी वृत्ति होनेसे द्रव्यप्रत्यय उसी प्रकारके कर्मके बन्धक होते हैं । (२) लत्वज्ञान होनेपर उदित कर्मभावको जीव. भाव न माना जा सकनेसे, वह कर्मभाव जीवभाव न माना जा सकनेसे जीवभाव नहीं बनता, और तब द्रव्यप्रत्यय उस प्रकारके कर्मके बन्धक नहीं होते । दृष्टि-१- निमित्तत्वनिमित्तदृष्टि एवं निमिसदृष्टि (२०१, ५३म)। २- प्रतिषेधक शुद्धनय {४६)। प्रयोग-कर्मभावसे हटनेके लिये अपने ज्ञानमात्र सहजभावमें श्रात्मत्व स्वीकार कर जानमात्र भावमें रत होनेका पौरुष करना । १६८ ।। अब ज्ञानीके द्रव्यालयका प्रभाव दिखलाते हैं:-[तस्य ज्ञानिनः] उस ज्ञानोके [पूर्व
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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