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________________ ३०२ समयसार तत प्रास्रवणनिमित्तत्व निमित्तत्वादागद्वेषमोहा एवानवाः, ते चाज्ञानिन एव भवतीति अर्थादेवापद्यते ।।१६४.१६५।। ते-प्रथमा बहु० । दु तु-अध्यय । कम्मस्स कर्मण:-पानी एक । कारण-प्रथमा एक० । होति भवति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन क्रिया। तेसि तेपां-पष्ठी वाहु० । पि अपि-अन्यय । होदि भवति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० । जीवो जीव:-प्रथमा एकच-अव्यय । रागदोसादिभाबकरो रागद्वेषादिभावकर:-प्रथमा एकवचन ।। १६४.१६५ ।। -- - भाव है। दृष्टि-१- उपादानदृष्टि (४६ब)। २-- उपादानदृष्टि (४६ब)। ३- निमित्तदृष्टि (५३) । ४-उपादानदृष्टि (४६ब)। प्रयोग-कर्मबन्धका मूल कारण अपने रागादिभावोंको जानकर रागादिभावोंसे छुटकारा पाने के लिये रागादिविकारता सहज मानस्वभावमें जाम होगेका पौरुष करना ।।१६५|| ___ अब ज्ञानीके उन अास्रवोंका प्रभाव दिखलाते हैं:---[सम्यग्दृष्टेः] सम्यग्दृष्टिके [आस्रवबंधः] अाम्रब बंध [नास्ति] नहीं है [तु] किंतु [आस्रवनिरोधः] आस्रवका निरोध है [तानि] उनको [अबघ्नन] नहीं बांधता हुना सः] वह [संति] सत्तामें मौजूद [पूर्वनिबद्धानि] पहले बांधे हुए कर्मों को [जानाति मात्र जानता है । टोकार्य-चूंकि वास्तव में ज्ञानीके ज्ञानमय भावोंसे परस्पर विरोधी प्रज्ञानमय भाव रुक जाते हैं इस कारण प्रास्रवभूत राग, द्वेष, मोह भावोंके निरोधसे ज्ञानी के प्रास्त्रवका निरोध होता ही है । इसलिये ज्ञानी, पासवनिमित्तक ज्ञानावरण आदि पुद्गल कोको नहीं बांधता 1 किन्तु सदा उन कर्मोका अकर्ता होनेसे नवीन कर्मोको नहीं बांधता हुआ पहले बंधे हुए सत्तारूप अवस्थित उन कोको केवल जानता ही है । भावार्थ-ज्ञानी होनेपर अज्ञानरूप राग द्वेष मोह भावोंका निरोध होता है और प्रास्रव के निरोधसे नवीन बंधका निरोध होता है तथा जो पूर्व बंधे हुए सत्तामें स्थित हैं, उनका ज्ञाता ही रहता है कर्ता नहीं होता । यद्यपि अविरत सम्यग्दृष्टि प्रादिके चारित्रमोहका उदय है, पर उसको ऐसा जानना कि यह उदयकी बलवत्ता है, वह अपनी शक्तिके अनुसार उनको रोगरूप जानकर दूर करता ही है इसलिये वे हुए भी अनहुए सरीखे कहे जाते हैं, वहां जो अल्पस्थिति अनुभागरूप बंध होता वह अज्ञानके पक्षमें नहीं गिना जाता, अज्ञान के पक्षमें तो जो मिथ्यात्व व अनंतानुबंधोके निमित्तसे बँधता है, वह गिना जाता है । इस प्रकार ज्ञानीके प्रास्त्रव व बंध नहीं गिना गया। प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्व गाथामें प्रास्रवका स्वरूप बताया गया था और यह
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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