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________________ - २६३ - । पुण्यपापाधिकार अथ कर्मणः स्वयं बंधत्वं साधयति सो सब्वणाणदरिसी कम्मरएण णियेणवच्छण्णो । संसारसमावण्णो ण विजाणदि सव्वदो सव्वं ॥२६०॥ यह सर्वज्ञानदर्शी तो मि निज कमरजसे पाच्छादित । __संसारमें भटक कर, यह सबको जान नहिं सकता ॥१६०॥ स सर्व ज्ञानदर्शी कमरजसा निजेनाबच्छन्नः । संसारसमापन्नी न विजानाति सर्वतः सर्वम् ।। १६० ।। यतः स्वयमेव ज्ञानतया विश्वसामान्य विशेषज्ञानशीलमपि ज्ञानमनादिस्वपुरुषापराधप्रव नामसंज्ञ-त, सम्वणाणदरिसि, कम्मरय, णिय, अवच्छण्ण, संसारसमावग्ण, ण, सव्वदो, सब्ब । धातुसंझ-दरिस दर्शनाया, अब-छण हिसायां, जाण अवबोधने । प्रातिपदिक-तत्, सर्वज्ञानदर्शिन्, कर्मरजस्, निज, अवच्छन्न, संसारसमापन्न, न, सर्वतः, सई । मूलधातु--इशिर प्रेक्षणे, छद अपबारणे संघरो भ्वादि चुरादि, वि-ज्ञा अवबोधने । पदविवरण--सो सः-प्रथमा ए० । सव्वणाणदरिसी सर्वज्ञानदर्शी कम्मजाननेके स्वभाव वाला होनेपर भी ज्ञान प्रनादिकालसे अपने पुरुषापराधसे प्रवर्तमान कर्मरूप मलसे आच्छादितपना होनेके कारण परभाव बन्धरूप बंधावस्थामें सब प्रकारके सब ज्ञेयाकाररूप अपने स्वरूपको नहीं जानता हुमा अज्ञानभावसे ही यह प्राप स्थित है । इस कारण निश्चय हुआ कि कर्म स्वयं ही बंधस्वरूप है। इसीलिये स्वयं बंधरूप होनेसे कर्मका प्रतिषेध किया गया है । भावार्थ-यहाँ ज्ञान शब्दसे यात्माका ही ग्रहण किया गया है । सो यह ज्ञान. स्वभावसे तो सबको देखने और जानने वाला है, परन्तु अनादिसे आप अपराधी है, इसलिये बाँधे हुए कर्मोस पाच्छादित है। अत: अपने सम्पूर्ण रूपको नहीं जानता हुआ, प्रज्ञानरूप हुप्रा आप स्थित है, सो पाप तो अपने अज्ञानभावरूप परिणमन करता है और तब कर्म स्वयमेव बन्धरूप हो जाते हैं, इसीलिए कर्मका प्रतिषेध करना बताया है । प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्व गाधात्रिकमें यह बताया गया था कि शुभकर्म मोक्षहेतुका तिरोधान करते हैं । अब इस गाथामें बताया है कि कर्म स्वयं जीवको बन्धन है। तथ्यप्रकाश--(१) यह ज्ञान (मात्मा) ज्ञानस्वरूप होनेसे स्वयं ही सर्वज्ञता व सर्वदशिताके स्वभाव वाला है । (२) यह जीव अनादिकालसे स्वपुरुषापराधसे चले आये कर्ममल से प्राक्रान्त होनेसे इस संसारदशामें प्रज्ञानभावके कारण सबको नहीं जान सकता है । (३) ग्रज्ञानरूप शुभाशुभकर्म जीवको स्वयं हो बन्धन हैं । (४) शुभाशुभ कर्म स्वयं बन्धरूप होनेसे प्रतिषेध्य हैं। सिद्धान्त---(१) प्रात्मा स्वयं सहज परमज्ञानविकास स्वभाव वाला है। (२) पौद्गलि कर्मविपाकोदयसे यह जीब संसारसमापन्न है । (३) अपने अज्ञानापराघसे यह जीव कलु.
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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