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________________ पुण्यपापाधिकार २८१ अथ ज्ञानं विधापयति--- परमट्ठम्हि दु अठिदो जो कुणदि तवं वदं च धारेई । तं सव्वं वालतवं वालवदं विति सव्वण्हू ॥ १५२ ॥ परमार्थ में न ठहरा, जो कोई तप करे व ब्रत धारे । सर्वज्ञ देव कहते, बालतपहि बालबत उसको ॥ १५२ ॥ परमार्थे स्वस्थितः यः करोति तपो व्रतं च धारयति । तत्सर्व वालतपो बालबतं वदन्ति सर्वज्ञाः ।। १५२ ।। ज्ञानमेव मोक्षस्य कारणं विहितं परमार्थंभूतज्ञानशून्यस्याज्ञानकृतयो ततपःकर्मणोः । प्राकृतशब्द-परमट्ठ, दु, अठिद, ज, त५, ३६, त, सक्ष, पालतद, पालमप, सः । गतधातुट्ठा गतिनिवृत्ती, कुण करणे । प्रकृतिशब्द -- परमार्थ, तु, अस्थित, यत्, तपस्', बत, च, तत्, सर्व, वालतरस्, वालवत, सर्वज्ञ । मूलधातु-ऋ गतिप्रापणयोः, ष्ठा गतिनिवृत्तो, डुकृत्र करणे, तप संतापे ऐश्वर्य स्वादि दिवादि, वद व्यक्तायां वाचि स्वादि, ज्ञा अवबोधने क्रयादि। पदविवरण --परमार्थ-सप्तमी एक० । तु अब उस ज्ञानको विधि बतलाते हैं--[परमार्थे तु] ज्ञानस्वरूप प्रात्मा [अस्थितः] अस्थित [यः] जो [तपः करोति] तप करता है [च] और [वतं धारयति] प्रतको धारण करता है [तत्सर्व] उस सब तप प्रतको [सर्वमाः] सर्वज्ञदेव [बालतपः] अज्ञान तप [बालबतं] और प्रज्ञान व्रत [विदंति कहते हैं। टोकार्थ-ज्ञान ही मोक्षका कारण कहा गया है, क्योंकि परमार्थभूत ज्ञानसे शून्य अज्ञानसे किये तप और बतरूप कर्म ये दोनों बंधके कारण हैं, इसलिये बालतप व बालव्रत उन दोनोंका बाल ऐसा नाम कहकर प्रतिषेध किये जानेपर पूर्वकथित ज्ञानके ही मोक्षका कारपना बनता है। भावार्थ-प्रज्ञानमें किये तप व्रत बंधके ही कारण हैं अतः ज्ञानको हो मोक्ष कारणपना बनता है। प्रसंगविवरण--अनन्तरपूर्व गाथामें बताया गया था कि भान ही मोक्षहेतु है। अब इसी ज्ञानकी महिमाको प्रशानदौमत्य बताकर इस माथामें वरिणत किया है। तथ्यप्रकाश-(१) शाम ही मोक्षका कारण है, क्योंकि वह स्वभावतः परविविक्त है। (२) ज्ञानशून्य पुरुषके प्रशानकृत व्रत तप नादि कर्मबन्धके ही कारणभूत हैं । (३) अज्ञानकृत तप प्रत वालतप व वालवत कहलाते हैं । (४) अज्ञानकृत बत तप कर्म मोक्षमार्गमें प्रतिषिद्ध हैं। सिद्धान्त---(१) प्रशानभावसे किये हुए अत तप आदि कर्म कर्मबंधके निमित्तभूत हैं । (२) ज्ञानभावमें प्रज्ञान न होनेसे ज्ञान ही मोक्षहेतु है ।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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