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________________ २८० समयसार प्रवृत्तज्ञानगमनमयतया समयः । सकलनयपक्षासंकोण कज्ञानतया शुद्धः । केवलचिन्मात्रवस्तुतया केवली। मननमात्रभावमात्रतया मुनिः । स्वयमेव ज्ञानतया ज्ञानी । स्वस्य ज्ञानस्य भावमात्र. तया स्वभावः स्वतश्चितो भवनमात्रतया सद्भावो वेति शब्दभेदेऽपि न च वस्तुभेदः ॥१५१ ॥ गतो, शुध शोचे, मनु अवबोधने तनादि, ज्ञा अवबोधने, ष्ठा गतिनिवृत्तौ, प्र-आप्ल प्रापणे, निर् वन संभक्ती । पदविवरण --परमार्थः-प्रथमा एक० । खलु-अव्यय । समयः, शुद्धः, यः, केवली, मुनिः, ज्ञानीप्रथमा एकवचन । तस्मिन्- सप्तमी एक । स्थिताः-प्रथमा बहुवचन । स्वभावे-प्र० एक० । मुनयः-प्रथमा बहु । प्राप्नुवन्ति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष बहुवचन । निर्वाणं-द्वितीया एकवचन ।। १५१ ॥ सत्तारूप प्रवर्तनके कारण स्वभाव है तथा अपनी चेतनाका सत्तारूप होनेसे सद्भाव है। ऐसे शब्दोंके भेद होनेपर भी वस्तुभेद नहीं है । भावार्य-मोक्षका उपादान कारण प्रात्मा ही है और प्रात्माका परमार्थसे ज्ञानस्वभाव है, अतः जो ज्ञान है वह मात्मा ही है, प्रारमा है वह ज्ञान ही है, इसलिये ज्ञानको हो मोक्षका कारण कहना युक्त है। प्रसंगविवरण-----अनन्तरपूर्व गाथामें सिद्धान्त द्वारा शुभ अशुभ कर्मको प्रतिषेध्य बता. कर सिद्ध किया था कि शुभ अशुभकर्म दोनों बंधहेतु है । इस विवरणपर यह जिज्ञासा होती है कि तब फिर मोक्षहेतु क्या है ? इसी जिज्ञासाका समाधान इस गाथामें किया है। तथ्यप्रकाश-(1) मान ही मोहेद है, क्योंकि मान जान ही रहना, पूर्णतया परसे पृथक् हो जाना मोक्ष है सो बह मोक्ष परविविक्त सहजज्ञानस्वरूपको प्राराधनासे ही हो सकता है। (२) ज्ञान शुभाशुभकर्मके बन्धका हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि स्वरूप व स्वभाव बन्ध के लिये नहीं होता। (३) ज्ञान (ज्ञानमय प्रात्मा) ही परमार्थ है, क्योंकि ज्ञानभाव समस्त कर्मादिसे न्यारा चिज्ज्योतिमात्र वस्तु है। (४) ज्ञान (ज्ञानमय प्रात्मा) ही समय है, क्योंकि यह चेतन पदार्थ ही एक साथ स्वयं जानता व परिणामता है अथवा सम्यक् अय (ज्ञान) शला है अथवा समरसीभावसे शुद्धस्वरूपमें इसका गमन है । (५) यह ज्ञान शुद्ध है, क्योंकि यह केवल चिन्मात्र वस्तु है । (७) यह शान मुनि है, क्योंकि यह ज्ञानभाव मननमात्र भाव है। (८) यह ज्ञान ज्ञानी है, क्योंकि यह स्वयं ज्ञानस्वरूप है। (६) विशुद्ध यह ज्ञान (ज्ञानमय प्रात्मा) अपने भवनमें जाननस्वरूपमें निर्विकल्प स्थित होकर निर्वाणको प्राप्त करता है । सिद्धान्त-(१) शुद्ध चित्स्वभावको आराधनासे कर्ममोक्ष होता है । (२) यह ज्ञानमात्र अन्तस्तत्त्व अभेद शुद्ध चिज्ज्योतिमात्र है। दृष्टि-- शुद्ध भावनापेक्ष शुद्धद्रव्यार्थिकनय (२४ब) । २- शुद्धनय (४९)। प्रयोग केवल चित्प्रकाशमात्र अन्तस्तत्व में स्थित होनेका पौरुष करना, क्योंकि इस विधिसे ही निर्वाण प्राप्त होता है ।। १५१ ।।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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