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________________ समझ लेने से नयष्टिका प्रयोग व आत्महिनके लिये आत्मप्रयोग सही होगा। जैसे दूध गाय, भैस, बकरी के दूधको कहते हैं और आकके पेड़से निकले सफेद रसको भी दूध कहते हैं, आकका दूध पीनेसे मरण हो जाता है तो आकके दूध का उदाहरण देकर सर्वथा यह कहना कि दूध प्राणघातक है यह क्या युक्त है व ऐसी श्रद्धासे जीवन चलेगा क्या ! हाँ वहाँ जो विवेक करेगा कि आकका दूध घातक है गाम भैस आदिका दूध घातक नहीं, बल्कि पोषक है वह अपना जीवन में सही प्रयोग करेगा। पाठ २१-स्वतन्त्र सत्त्व व अत भाषका विवेक वस्तु दव्य रूपसे, गुणरूपसे व पर्यामरूपसे शेय होता है। वहाँ द्रष्यका लक्षण अन्य है, गुणका लक्षण अन्य है, पर्यायका लक्षण अस्प है। गुणोंमे भी प्रत्येक गुणका लक्षण अन्य-अन्य है। पर्यायों में भी प्रत्येक पर्यायका लक्षण अन्य अन्य है। इनका वर्णन करते हुए अपना कौशल बताने के लिये यदि कोई यों कहने लगे कि प्रत्येक गुण स्वतन्त्र मत है, प्रत्येक पर्याय स्वतात्र मत है, गण स्वतन्त्र सत् है पर्याय स्वतन्त्र खत है, सो यह सब कथन स्याद्वादशासन से बहिभूत है । पर्याय स्वतःच सत् नहीं इसका संक्षिप्त निरूपण ८ ३ पाठ है । गुण स्वतन्त्र सत् नहीं इसका अन्न यहाँ विचार कीजिये। जो स्वतन्त्र सत् याने सत् होता है उसके ये लक्षण है.-१-उत्पादश्यध्रौव्ययुक्त सत् २-गुणपर्यायवद्रव्य ३-प्रविभक्तप्रदेशत्व, ४-साधारणगरा वाला, ५-असाधारणगणवाला, ६-द्रव्यध्यजनपर्यायवाला, जाण व्यज्जनपर्यायवाला । गुणमें ये सातों ही बातें नहीं पाई जाती हैं । गुण उत्पादव्यय वाला नहीं है, गुणमें गुण होते नहीं हैं, क्योंकि गुण निगुण हैं, 'द्रव्याश्रमा निगुणा गुणाः', गुणों के प्रदेश द्रव्य व पर्याय से भिन्न नहीं है । गुणोंका आकार नहीं होता । अतः सातों बातें ही गुणमें नहीं हैं। गुण और पर्याय सद्भूतद्रव्यको तारीफ है । इस तारीफको समझने के लिये इनका लक्षण जानना होता है । सो लक्षणभेदसे गुण व पर्यायोंका विशिष्ट परिचय होता है । यो द्रव्य, मुण, पर्यापमें, व परस्पर सब गुणों में, परस्पर सब पर्यायों में अतद्भाव है, किन्तु स्वतन्त्र-स्वतन्त्र सस्व नहीं है। हाँ वस्तुको द्रव्य कहते हैं सो द्रव्यको स्वतन्त्र सत् कह सकते हैं । गुणोंको व पर्यायको स्वतन्त्र मत कहना मीमांसकोंका सिद्धान्त है। इस प्रकार द्रव्य गुण पर्यायके सम्बन्ध में सही जानकारी होने पर नयोंका प्रयोग आत्महितके लिये आश्मप्रयोग सही होता है। पाठ २२-दृष्टि सूची . सामनय (मैगममय व्याधिक) १. भूतनगम नय (जैसे आज दीपावलिके दिन वर्षमान स्वामी मोक्ष गये इस प्रकार वर्तमान में भूतका प्रकाश)! २. प्राधिगमलय (जैसे अहंन्त तो सिद्ध हो ही चुके इसप्रकार वर्तमान में भावीका प्रकास)। ३. वर्तमान समनय (जैसे भात पक रहा है, आदि इसप्रकार निष्पन्न व अनिष्पन्नका वर्तमानमें निष्पन्नवत् प्रकाश। संग्रहनय अध्याथिकमय ४, परसंग्रहनामक ग्यापिकमय (जैसे-सत्, सत् में सबका संग्रह है, क्योंकि चेतन अचेतन सभी पदार्थ सरस्वरूप हैं) ५. अपरसंग्रहनयनामक द्रव्यापिकनय (जैसे-जीक । जीवमें जीवोंके सिवाय अन्यका संग्रह नहीं) ६, परमशुद्ध अपरसंग्रहलामक याचिकमय (जैसे-ब्रह्मस्वरूप आत्मा, जिसके एकान्तमें सांख्याविसिद्धान्त हो जाते हैं) ७. शुख अपरसंग्रहनयनामक द्रव्याबिकनम (जैसे-मुक्त जीव, इसमें अतीत अनागत वर्तमान सर्व सिठोंका संग्रह है। ८. अशुद्ध अपरसंग्रहनयनामक द्रव्यापिकनय (जैसे संसारी जीव, इसमें पस स्थावर प्रादि सभी अशुद्धपर्यायवान जीवोंका संग्रह है। मनन्तिम व्यवहारनय व्याथिकमय ६. परमसंग्रहभेवक व्यवहारनयनामक द्वयमाथिफनए (जसे-द्रव्य ६ प्रकारके हैं जोय, पुद्गल, धर्म,अधर्म आकाश व काल) ( ३७ )
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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