SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 319
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २६८ समयसार कर्ता कर्ता भवति न यथा कर्म कर्मापि नैव ज्ञानं ज्ञानं भवति च यथा पुद्गलः पुद्गलोऽपि । शानज्योतिज्वलितमपलं व्यक्तमतस्तथोच्चश्चिच्छतीनां निकरभरतोऽत्यंतगंभीरमेतत् ॥६६॥ ॥१४४॥ ॥ इति जीवाजोवो कर्तृकर्मवेषविमुक्तौ निष्क्रांतो ॥ इति श्रीमदमृतचंद्रसूरिविरचितायां समयसारव्याख्यायामात्मख्याती कर्तृकर्मप्ररूपको द्वितीयोऽकः ॥ २ ॥ श्रिया । इति-अव्यय । केवल-अव्ययभावे । व्यपदेश-द्वितीया एक० । सर्वनयपक्षरहित:-प्रथमा एकवचन । भणित:-प्र० ए० कृदन्त । यः, सः-प्र० ए० । समयसार:-प्रथमा एकल नन ॥१४४।। जाननक्रिया नहीं, जाननक्रिया करणक्रिया नहीं। (१३) सम्याज्ञान प्रकाशमें शानी कर्ता नहीं होता तब कार्माणवर्गणा कर्मरूप नहीं होती। ___ सिद्धान्त-- सम्यक् शानबलसे प्रात्मा प्रात्मामें उपयुक्त होता है । (२) समयसार अविकल्प प्रखण्ड चिन्मात्र अन्तस्तत्त्व है । दृष्टि-१- शुद्धनिश्चयनय (४६), अपूर्ण शुद्धनिश्चयनय । (४६१), २-प्रखंड परमशुद्धनिश्चयनय (४४)। प्रयोग-सर्वनयपक्षरहित होकर दर्शनज्ञानसामान्यात्मक पात्मतत्त्वको अन्तः अनुभवने का पौरुष करना ॥ १४४ ।। ॥ इति श्रीमदमृतचंद्रसूरिविरचित समयसारव्याख्या प्रात्मख्याति कर्तृ कर्माधिकार सम्पूर्ण ।।२।।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy