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________________ २६४ पक्षातिक्रांत एव समयसार इत्यवतिष्ठते समयसार सम्म सगाणं एसो लहदित्ति गावरि ववदेसं । सव्वगायकवरहिदो भणिदो जो सो समयसारो ॥१४४॥ सर्वनयपक्ष अपगत, जोकर कहा । यह ही केवल सम्यग् दर्शन संज्ञान कहलाता ॥ १४४ ॥ सम्यग्दर्शनज्ञानमेष लभते इति केवलं व्यपदेशं । सर्वनयपक्षरहितो भणितो यः स समयसारः ।। १४४ ।। श्रयमेक एव केवलं सम्यग्दर्शनज्ञानव्यपदेशं किल लभते । यः खल्वखिलन यपक्षाक्षुण्णतया विश्रांत समस्त विकल्प व्यापारः स समयसारः । यतः प्रथमतः श्रुतज्ञानावष्टंभेन ज्ञानस्वभाव - मात्मानं निश्चित्य ततः खल्वात्मख्यातये परख्यातिहेतून खिला एवेन्द्रियानिन्द्रियबुद्धीरधीर्य श्रात्माभिमुखीकृतमतिज्ञानतत्त्वः, तथा नानाविधनयपक्षालंबनेनानेक विकल्प राकुलयंती: श्रुतज्ञान नामसंज्ञ – सम्मदंसणणाण, एत, इति णवरि, बजदेस, सव्वणयपक्खरहिद, भणिद, जत, समयतथा नाना प्रकारके नयोंके पक्षोंको अवलम्बन कर अनेक विकल्पोंसे श्राकुलता उत्पन्न कराने वाली श्रुतज्ञानकी बुद्धिको भी गौण कर तथा श्रुतज्ञानको भी श्रात्मतत्व के स्वरूप में सम्मुख करता हुआ अत्यन्त निर्विकल्परूप होकर तत्काल अपने निजरससे ही प्रकट हुआ आदि, मध्य और अन्तके भेदसे रहित श्रनाकुल एक ( केवल ) समस्त पदार्थ समूहरूप लोकके ऊपर तैरतेकी तरह प्रखंड प्रतिभासमय, अविनाशी, अनन्त विज्ञानघन परमात्मस्वरूप समयसारको ही प्रनुभवता हुआ सम्यक् प्रकार देखा जाता है, श्रद्धान किया जाता है, सम्यक् प्रकार जाना जाता है । इस कारण सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान समयसार ही है । भावार्थ – पहले तो भ्रागमज्ञान से श्रात्माको ज्ञानस्वरूप निश्चय करना, पीछे इन्द्रियबुद्धिरूप मतिज्ञानको भी ज्ञानमात्रमें हो मिलाना तथा श्रुतज्ञानरूप नयोंके विकल्प मेट श्रुतज्ञानको भी निर्विकल्प कर एक ज्ञानमात्रमें मिलाना और प्रखण्ड प्रतिभासका अनुभव करना यही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान नाम पाता है, ये दर्शन ज्ञान आत्मासे कुछ पृथक नहीं है । अब इसी का कलशरूप काव्य कहते हैं - प्राक्रामन् इत्यादि । अर्थ-नयोंके पक्ष बिना fafare भावको प्राप्त हुम्रा जो समय ( श्रागम व आत्मा) का सार सुशोभित होता है, जो कि निश्चित पुरुषों द्वारा स्वयं प्रास्वाद्यमान है अर्थात् उन्होंने अनुभव से जान लिया है। वही यह भगवान्, जिसका विज्ञान ही एक रस है, ऐसा पवित्र पुराण पुरुष है । इसको ज्ञान कहो अथवा दर्शन कहो अथवा कुछ अन्य नामसे कहो, जो कुछ है सो यह एक ही है, मात्र सीर्थप्रवृत्तिके लिये वह अनेक नामोंसे कहा जाता है ।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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