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________________ २५२ समयसार पत्तिः । अथ चैकस्यैव जीवस्य भवति रागाद्यज्ञानपरिणामः ततः पुद्गलकर्मविपाकाद्धेतोः पृथभूतो जीवस्य परिणामः ।। १३७.१३५ ।। जायते-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० । जीवस्य-षष्ठी एक०। रागादिभिः-तृतीया बहुः । तत्-अन्ययार्थे हेतो । कर्मोदयहेतुभिः-तृतीया बहु । विना-अव्यय । जीवस्य-षष्ठी एकवचन । परिणामः-प्रथमा एकवचन ।। १३७-१३८ ।। का निमित्त होनेपर भी अपनी स्वभावदृष्टिके अभावसे अपनी निर्बलताके कारण हुए जानकर अपनी स्वभावदृष्टिको प्रबल बनावें ताकि कर्मफल अव्यक्त होकर निकल जावें और संसारबन्धनसे बध जावें ॥ १३४-१३८ । अब कहते हैं कि पुद्गलद्रव्यका परिणाम जीवसे पृथक ही है:-[यदि] यदि जीवेन सह चैव जीवके साथ हो [पुद्गलद्रव्यस्य] पुद्गलद्रव्यका कर्मपरिणामः] कर्मरूप परिणाम होता है, तो [एवं] इस प्रकार [पुगलजीवो द्वौ अपि] पुद्गल और जीव दोनों [खलु ही [कर्मत्वं प्रापन्नौ] कर्मत्वको प्राप्त हो जावेंगे [तु] परंतु [कर्मभावेन] कर्मरूपसे [परिणामः] परिणाम [एकस्य] एक [पुद्गलद्रव्यस्य] पुद्गलद्रव्यका होता है [तत्] इसलिये [जीवमावहे. तुभिः धिना] जीवभाव निमित्तकारणसे पृथक् [कर्मणः] कर्मका [परिणामः] परिणाम है। सात्पर्य-कर्मपरिणमन जीबसे पृथक ही है जैसे कि जीवपरिणाम पौद्गलिक कर्म से पृथक है। टीकार्थ-यदि पुद्गलद्रव्यका कर्मपरिणाम उसके निमित्तभून रागादि अज्ञान परिणाम रूप परिणत जीवके साथ ही होता है, इस प्रकार तर्क उपस्थित किया जाय तो जैसे मिली हुई हल्दी और फिटकरी दोनोंका साथ ही लाल रंगका परिणाम होता है, उसी प्रकार पुद्गलद्रव्य और जीव दोनोंके ही कर्मपरिणामकी प्राप्तिका प्रसंग पा जायगा, किन्तु एक पुद्गलद्रव्यके ही कर्मत्व परिणाम होता है । इस कारण कर्मबन्धके निमित्तभूत जीवके रागादिस्वरूप प्रज्ञानपरिणामसे पृथक् ही पुद्गलकर्मका परिणाम है।। भावार्ष-पुद्गलद्रव्यका कर्मपरिणाम होना यदि पुद्गल व जीव दोनोंका ही माना बाय तो दोनोंके ही कर्मपरिणामका प्रसंग आ जायगा, किन्तु जीवका अजानरूप रागादि- परिणाम कर्मका निमित्तमात्र है । इस कारण पुद्गलकमका परिणाम जीवसे पृथक ही है। प्रसंगविवरस-मनन्तरपूर्व गाथायुगल में बताया गया था कि जीवका परिणाम पुद्गलद्रव्यसे पृथग्भूत है । प्रब: इन दो गाथावो में बताया है कि पुद्गलद्रव्यका परिणाम जीव से पृथग्भूत है। ... तथ्यप्रकाश-१-पुदुमलद्रव्यका परिणमन पुद्गलद्रव्यमें पुद्गलद्रव्यके अकेलेके परिण•
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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