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कर्तृकर्माधिकार
अण्णाणस्स स उदय जं जीवाणं तच्चय्वलद्वी । मिच्छत्तस्स दु उदो जीवस्स असहाणत्तं ॥ १३२ ॥ उदय संजमस्सदु जं जीवाणं हवेह अविरमणं । जो दु कलुसोवोगो जीवाणं सो कसाउद ॥ १३३॥ तं जाण जोगउदयं जो जीवाणं तु चिउच्छा हो । सोहण सोहगां वा काव्वो विरदिभावो वा ॥ १३४॥ एदेसु हेदुभूदेसु कम्मइयवग्गणागयं जं तु । परिणाम अहिं गाया। वरणादिभावेहिं ॥ १३५ ॥ तं खलु जीवद्धि कम्मयवग्गणमयं जया । तहया दु होदि हेदू जीवो परिणामभावाणं ॥ १३६ ॥
श्रज्ञानका उदय वह, जो जीवोंको न तत्त्व उपलब्धी । मिथ्यात्वका उदय जो, जीवोंके प्रश्रद्धानपना ॥ १३२ ॥ उदय असंयमका यह, जो जीवोंको न पापसे विरती । उदय कषायोंका यह, कलुषित उपयोगका होना ॥१३३॥
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नामसंज्ञ – अण्णाण, त, उदय, ज, जीव, अतच्चउवलद्धि, मिच्छत्त, दु, उदअ, जीव, असहाणत, उदय, असंजम, दु, ज, जीव, अविरमण, ज, दु, कलुसोवओग, जीव, त, कसाउद, त, जोगउदअ, ज, जीव, तु, चिट्टउच्छाह, सोहण, असोहण, व. कायन्य, विरदिभाव, वा, एत, हेदुनद, कम्मइयबम्गण्णगअ ज, तु, अट्ठविह, गाणावरणादिभाव, त, खलु जीवणिबद्ध, कम्मइयवस्गणागअ, जझ्या, तुझ्या, दु, हेदु, जीव, परिणामभाव । धातुसंज्ञ-उद्-अय गतौ, सद् दह धारणे, उब-उज्ज योगे कस तनूकरणे, उत् साह साधने, परि-नम नम्रीभावे, हो सत्तायां । प्रकृतिशम्य अज्ञान, तत्, उदय, यत्, जीव, अतत्त्वोपलब्धि, मिथ्यात्व, तु, उदय, जीव, अश्रद्दधानत्व, उदय, असंयम, तु, यत्, जीव, अविरमण, यत्, तु, कलुषोपयोरा, में होते हैं, उनमें परस्पर निमित्तनैमित्तिकभावमात्र बना है ।
टोकार्थ - प्रयथार्थं वस्तुस्वरूपकी उपलब्धिसे ज्ञानमें स्वादरूप होता हुआ अज्ञानका उदय है । और नवीन कर्मो के हेतुभूत मिथ्यात्व असंयम, कषाय, योगोदय ये अज्ञानमय चार भाव हैं । उनमें से जो तत्त्वके प्रश्रद्धानरूपसे ज्ञानमें प्रास्वादका श्रना वह तो मिथ्यात्वकां उदय है; जो अत्याग भावसे ज्ञान में प्रास्वादरूप प्राये वह असंयमका उदय है; जो मलिन उपयोगपनेसे ज्ञानमें प्रास्वादरूप प्राये, वह कषायका उदय है, और जो शुभाशुभप्रवृत्तिनिवृत्तिरूप