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समयसार णाणमया भावानो णायामश्रो चेन जायदे भालो। जम्हा तम्हा णाणिस्स सब्बे भावा हु णाणमया ॥१२८॥ अण्णाणमया भावा अण्णाणो चेव जायए भावो। जम्हा तम्हा भावा अण्णाणमया अणाणिस्स ॥१२६॥
ज्ञानमय भावसे तो, ज्ञान परिणाम हो जनित होता। इस कारण ज्ञानीके, सारे परिणाम ज्ञानमय ही हैं ॥१२॥ भाव अज्ञानमयसे, होता अज्ञानभाव इस कारण ।
अज्ञानी आत्माके, भावहि अज्ञानमय होते ॥१२६॥ ज्ञानमयाद्भावाद् ज्ञानमयश्चैव जायते भावः । यस्मात्तस्माज्ज्ञानिनः सर्वे भावाः खलु ज्ञानमया: ॥१२८।। अज्ञानमयाद्भावादज्ञानश्चैव जायते भावः । यस्मात्तस्माद्भावादज्ञानमया अज्ञानिनः ॥१२॥
यतो ज्ञानमयाभावाद्यः कश्चनापि भावो भवति स सर्वोप्यज्ञानमयत्वमनतिवर्तमानो. ऽज्ञानमय एव स्यात् ततः सर्व एवाज्ञानमया प्रज्ञानिनो भावाः । यतश्च ज्ञानमयाद्भावाद्यः
नामसंज्ञ-णाणमझ, भाव, णाणमत्र, च, एव, भाव, ज, त, णाणि, सब्ब, भाव, दु, णाणमम, अण्णाणमअ.भाव, अध्णाणि, च, एव, भाव, ज, त, भाव, अण्णाणम, अणाणि ।। पातसंश-जा प्रादुर्भावे । प्रकृतिशब्द-ज्ञानमय, भाव, ज्ञानमय, च, एव, भाव, यत्, तत्, शानिन्, सर्व, भाव, खलु, शानमय अज्ञानमय, भाव, अज्ञान, च, एव, भाव, यत्, तत्, भाव, अज्ञानमय, अशानिन् । मूलधातु-जनी प्रादुर्भाव दिवादि, ज्ञा अवबोधने। पदविधरण-ज्ञानमयात्, भावात्-पंचमी एकवचन । ज्ञानमयः-प्रथमा एकवचनः । ही करना चाहिये ।।१२७।।
अब अगली गाथाके अर्थको सूचनाका काव्य कहते हैं-ज्ञानमय इत्यादि । पर्थज्ञानीके तो ज्ञानमय ही भाव होते हैं अन्य नहीं होता यह क्यों ? पोर अज्ञानीके अज्ञानमय ही सब पाव होते हैं अन्य नहीं यह कैसे ? इसी प्रश्नको उत्तररूप गाथा कहते हैं-[यस्मात्] जिस कारण [ज्ञानमयात भायात् च] ज्ञानमय भावसे [ज्ञानमय एव] ज्ञानमय ही [भावः] भाव [जायते] उत्पन्न होता है । [तस्मात् ] इस कारण [जानिनः] ज्ञानीके [खल] निश्चय से [सर्वे मावाः] सब भाव [ज्ञानमयाः] ज्ञानमय हैं । और [यस्मात्] जिस कारण [महानमयात् भावात् च] अज्ञानमय भावसे [अज्ञान एव] अज्ञानमय ही [भायः] भाव [जायते) उत्पन्न होता है [तस्मात्] इस कारण [प्रज्ञानिनः] अज्ञानीके [अज्ञानमयाः] अज्ञानमय ही [मावाः] भाव उत्पन्न होते हैं।
तात्पर्य-ज्ञानीके ज्ञानमय भाव होते हैं और प्रशानीके प्रज्ञानमय भाव होते हैं। टीकार्थ-जिस कारण निश्चयसे अज्ञानमय भावसे जो कुछ भाव होता है, वह सभी