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________________ कत कर्माधिकार २४३ कश्चनापि भावो भवति स सर्वोपि ज्ञानमयत्वमनतिवर्तमानो ज्ञानमय एव स्यात् ततः सर्वे एव शानमया शानिनो भावाः । ज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ताः सर्वे भावा भवंति हि । सर्वोप्यज्ञाननिर्वृत्ता भवत्यज्ञानिनस्तु ते ॥६७।। ।। १२८-१२६ ॥ च, एव-अव्यय । जायते वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन क्रिया । भाव:-प्र० ए०। यस्मात्, तस्मात्पंचमी एक० । शानिनः-षष्ठी ए० । सर्वे-प्र० बहु । भावा:-प्र० बहु० । खलु-अव्यय । ज्ञानमया:-प्रथमा बहु० । अज्ञानमयात्, भावात्-पंचमी एक० । अज्ञान:-प्रथमा ए० । जायते-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० । भाव:-प्र० एक० । यस्मात्, तस्मात्-पंचमी एकवचन। भावाः, अज्ञानमया:-प्रथमा बहु० । अज्ञानिनःषष्ठी एकवचन ।। १२८-१२६ ।। अज्ञानमयपनेको उल्लंघन नहीं करता हुआ अज्ञानमय ही होता है; इसलिए अज्ञानीके सभी भाब प्रज्ञानमय हैं । और जिस कारण ज्ञानमयभावसे जो कुछ भाव होता है, वह सभी ज्ञानमयपनेको नहीं उल्लंघन करता हुआ ज्ञानमय ही होता है, इसलिये ज्ञानीके सभी भाव ज्ञानमय हैं । अब इसी अर्थका कलशरूप काव्य कहते हैं-ज्ञानिनो इत्यादि । अर्थ-ज्ञानीके सभी भाव ज्ञानसे रचे हुए होते हैं और प्रज्ञानीके सभी भाव प्रज्ञानसे रचे हुए होते हैं । प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्व गाथामें बताया था कि अज्ञानीके अज्ञानमय भाव होता है और इससे वह कर्मको करता है तथा ज्ञानीके ज्ञानमय भाव होता है और इससे यह कर्म को नहीं करता। अब इस गाथामें बताया है कि ज्ञानीके ज्ञानमय हो भाव क्यों होता है और मज्ञानीके प्रज्ञानमय हो भाव क्यों होता है ? तथ्यप्रकाश---१- प्रशानमय भावसे बो कुछ भी भाव होता है वह सब प्रज्ञानमयता का उल्लंघन न करनेसे प्रज्ञानमय ही भाव होता है । २- ज्ञानमयभाधसे जो कुछ भी भाव होता है वह सब ज्ञानमयताका उल्लंघन न करनेसे ज्ञानमय ही होता है। सिद्धान्त-१- अज्ञानमय परभावको प्रात्मा मानने वाले विकल्पसे प्रज्ञानमय भाष ही प्रकट होता है । २- ज्ञानघन अन्तस्तत्त्वको दृष्टि वालेके ज्ञानसंस्कृत ही भाव होता। दृष्टि-१- अशुद्धनिश्चयनय (४७) । २- शुद्धनिश्चयनय, अपूर्ण शुद्धनिश्चयनय (४६, ४६ब)। प्रयोग-मूलमें अविकार ज्ञानस्वभावका पालम्बन होनेसे ज्ञानमय भाव प्रकट होता है सो अपना उपयोग अविकार ज्ञानस्वभावको दृष्टि में रखनेका पौरुष करना ॥ १२८-१२६ ॥ अब इस उक्त गाथार्थको ही दृष्टान्तसे दृढ़ करते हैं-- [यथा] जैसे [कनकमयात भावात्] सुवर्णमय भावसे [कुडलादयः भावाः] सुवर्णमय कुंडलादिक भाव जायते] उत्पन्न होते हैं [तु] और [अपोमयात् भावात्] लोहमय भावसे [कटकावयः] लोहमयी कड़े इत्या
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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