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________________ समयसार २४० fr ज्ञानमयभावात्किमज्ञानमयाद्भवतीत्याह अण्णाम भावो णाणियो कुरादि तेा कम्माणि । गाम गाणिस्स दुण कुदि ता दु कम्माणि ॥ १२७ ॥ भाव अज्ञानमय है, अज्ञानीको सुकर्मका कर्ता । ज्ञानमय भाव बुधका, सो नहिं वह कर्मका कर्ता ॥ १२७॥ अज्ञानमयो भावोऽज्ञानिनः करोति तेन कर्माणि । ज्ञानमयो ज्ञानितस्तु न करोति तस्मात्तु कर्माणि ॥ १३७॥ अज्ञानिनो हि सम्यक्स्वपरविवेकाभावेनात्यंत प्रत्यस्तमितविविक्तात्मख्यातित्वाद्यस्माद ! ज्ञानमय एव भावः स्यात् तस्मिंस्तु सतिं स्वपरयोरेकत्वाभ्यासेन ज्ञानमात्रात्स्वस्मात्प्रभ्रष्टः परारागद्वेषाभ्यां सममेकीभूय प्रथलिताहंकारः स्वयं किलैषोहं रज्ये रुष्यामीति रज्यते रुष्यति च तस्मादज्ञानमयभावादज्ञानी परी रागद्वेषावात्मानं कुर्वन् करोति कर्माणि । ज्ञानिनस्तु नाम- अण्णा पाणमअ, पाणि, दु, ण, त, दु, कम्म बातुसंज्ञ- कुण करणे । प्रकृतिशब्द – अज्ञानमय, भाव, अज्ञानिन, तत् कर्मन् ज्ञानमय, ज्ञानिन् तु न तत् श्रात्मस्वरूप में ठहरा हुआ वह ज्ञानी परद्रव्यस्त्ररूप राग-द्वेषोंसे पृथग्भूत हो जानेके कारण अपने रससे हो पर में अहंकार निवृत्त हो गया है, ऐसा हुआ निश्चयसे केवल जानता ही है, राग-द्वेषरूप नहीं होता। इसलिये ज्ञानमय भावसे शानो हुआ परद्रव्यस्वरूप जो राग-द्वेष उन रूप श्रात्मा को नहीं करता हुआ कमको नहीं करता है। भावार्थ - इस आत्माके क्रोधादिक मोहकी प्रकृतिका उदय भानेपर उसका अपने उपयोग में रागद्वेषरूप मलिन स्वाद श्राता है, सो मोही जीव भेदज्ञानके बिना अज्ञानी हुआ ऐसा मानता है कि यह रागद्वेषमय मलिन उपयोग ही मेरा स्वरूप है, यही मैं हूं, इस प्रकार अज्ञानरूप श्रहंकारसे आच्छन हुआ प्राणी कर्मोंको बांधता है । इस प्रकार अज्ञानमय भावसे कर्मबंध होता है और जब ऐसा है कि ज्ञानमात्र शुद्ध उपयोग तो मेरा स्वरूप है, 'वह मैं हूं' तथा रागद्वेष हैं वे कर्मके रस हैं, मेरे स्वरूप नहीं हैं, ऐसा भेदज्ञान होनेपर ज्ञानी होता है, अपनेको रागद्वेष भावरूप नहीं करता, केवल ज्ञाता ही रहता है, तब कर्मको नहीं करता । तब प्रसंगविवरण- अनन्तरपूर्व गाथा में बताया गया था कि ज्ञानीके ज्ञानमय भाव होता है धौर प्रशानोके भज्ञानमय भाव होता है । अब इस गाथामें उससे संबंधित इस जिज्ञासाका समाधान किया गया है कि अज्ञानमयभावसे क्या होता है और ज्ञानमयभावसे क्या होता है ? तथ्यप्रकाश - १ - प्रज्ञानीके सम्यक् स्वपरविवेक नहीं होता है । २- स्वपर विवेक न होनेसे एकत्वविभक्त ग्रात्माकी दृष्टि नहीं बनती । ३- एकत्वविभक्त भ्रात्माको दृष्टि न होनेसे
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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