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________________ कतृ कर्माधिकार २१७ वर्तमाने द्रव्य गुणांतरसंक्रमस्य विधातुमशस्यत्वादात्मद्रव्यमात्मगुरणं वात्मा न खल्वाधत्ते । द्रव्यातरसंक्रममंतरेणान्यस्य वस्तुनः परिणामयितुमशक्यत्वात्तदुभयं तु तस्मिन्ननादधानः कथं नु तत्त्वतस्तस्य कर्ता प्रतिभायात् । ततः स्थितः खल्वात्मा पुद्गलकर्मणामकर्ता ॥१०४।। डुकृत्र करणे । पदविवरण-द्रव्य गुणस्य-पष्टी एकवचन । च-अव्यय । आत्मा-प्रथमा एक० । न-अव्यय । करोति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन किया। पुद्गलमये-सप्तमी एक० ! कर्मणि-सप्तमी एक० । तत् द्वितीया एक०। उभयं-द्वि० एकः । अकुर्वन-प्रथमा एक० कृदन्त। तस्मिन्-सप्तमी एक० । कथअव्यय । तस्य-षष्ठी एक० । स:-प्रथमा एक० । कर्ता-प्रथम एकवचन ॥१०॥ नहीं होता, इस कारण यह प्रभाव नैमित्तिक है। (५) निश्चयतः जो अन्यमें अपना द्रव्य, गुरण, क्रिया कुछ नहीं डाल सकता वह अन्यका कर्ता कसे कहा जा सकता है ? (६) प्रात्मा अपना गुण व क्रिया कुछ भी पुद्गलकर्ममें नहीं डाल पाता, इस कारण निश्वयतः आत्मा पुद्गलकर्मोंका अकर्ता है । सिद्धान्त-(१) निमित्तभूत वस्तुका नात्य, क्षेत्र, काल. भाव कुछ भी उपादान में नहीं पहुंचता । (२) निश्चयतः किसी भी पर्यायका, उस पर्यायका स्रोतभूत वस्तु स्वयं होता है । दृष्टि- १- परद्रव्यादिग्राहक द्रव्याथिकनय (२६)। २- शुद्धनिश्चयनय (४६), अशुद्धनिश्चयनय (४७)। प्रयोग-परके द्रव्य गुण प्रादिसे रहित सहजसिद्ध चित्प्रकाशमय अन्तस्तत्त्वमें दृष्टि रखकर अपनेको निर्विकल्प अनुभवनेका पौरुष करना चाहिये ।। १०४ ॥ अब कहते हैं कि इसके सिवाय जो अन्य निमित्तनमित्तकादिभाव हैं उनको देख कुछ .. अन्य प्रकारसे कहना वह उपचार है-[जीवे] जीवके [हेतुभूते निमित्तरूप होनेपर होने वाले [बंधस्य तु] कर्मबन्धके [परिणामं] परिणामको [दृष्ट्वा ] देखकर [जीवेन] जीवके द्वारा [कर्म कृतं कर्म किया गया यह [उपचारेरण] उपचारमात्रसे [भव्यते] कहा जाता है। तात्पर्य-जीवके रागद्वेषविभावका निमित्त पाकर पौद्गलिक कर्ममें कर्मत्व परिणमन होता है, उस विषयमें अज्ञानी जीव कहता है कि जीवने कर्म किये हैं सो ऐसा कर्तापनकी बात कहना उपचारमात्र है। टोकार्थ-- इस लोक में प्रात्मा निश्चयतः स्वभावसे पुद्गलकर्मका निमित्तभूत नहीं है, तो भी अनादि अज्ञानसे उसका निमित्तरूप हुआ जो अज्ञान भाव, उस रूपसे परिणमन करने से पुद्गलकर्मका निमित्तरूप होनेपर पौद्गलिककर्मके उत्पन्न होनेसे पुद्गलकर्मको प्रात्माने किया, ऐसा विकल्प होता है, वह विकल्प निर्विकल्प विज्ञानधनस्वभावसे भ्रष्ट और विकल्पोंमें तत्पर अज्ञानियोंके होता है । वह विकल्प उपचार ही है, परमार्थ नहीं है।
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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