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________________ समयसार ज्ञानावरणपदपरिवर्तनेन कमंसूत्रस्य विभागेनोपन्यासाद्दर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुन मगोत्रांतरायसूत्रः सप्तभिः सह मोहरागद्वेषक्रोधमानमायालोभनोकर्ममनोवचनकायश्रोत्रचक्षुणिरसनस्पर्शनसूत्राणि षोडश व्याख्येयानि । अनया दिशान्यान्यप्यूह्यानि ।।१०१॥ बहु । ज्ञानावरणानि-प्रथमा बहु० । न-अव्यय । करोति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन । तानिद्वितीया बहु० । आत्मा-प्रथमा एक० । यः-प्र० ए० । जानाति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक ० । स:-प्रथमा एक० । भवति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एक० । ज्ञानी-प्रथमा एकवचन ।।१०१॥ दृष्टि-१- अशुद्धनिश्चयनय (४७) । प्रतिषेधक शुद्धनय (४६) । प्रयोग-पुद्गलोंके परिणामको पुद्गलोंमें ही जानकर व अपने ज्ञानपरिणामको अपने में ही जानकर एकत्वविभक्त निज ज्ञायक स्वरूपका पाश्रय लेकर सहज आनन्दका अनुभवन करना ।।१०१॥ अब कहते हैं कि अज्ञानी भी परद्रव्यके भावका कर्ता नहीं है:-(प्रात्मा) प्रात्मा (घ) जिस (शुभं शुभ शगुन ( गोगावलो करोति) करता है (खलु) वास्तव में (सः) वह (तस्य) उस भावका (कर्ता) कर्ता होता है (तत्) वह भाव (तस्य) उसका (कर्म) कर्म (भवति) होता है (तु स प्रात्मा) और वहीं प्रात्मा (तस्य) उस भावरूप कर्मका (वेदक:) भोक्ता होता है। तात्पर्य--प्रात्मा अपने ही भावका कर्ता होता है व अपने ही भावका भोक्ता होता है। टीकार्य—इस लोकमें प्रात्मा अनादिकालसे अज्ञानसे पर और प्रात्माके एकत्वके निश्चयसे तीन मंद स्वादरूप पुद्गल कर्मकी दोनों दशाओंसे स्वयं प्रचलित विज्ञानघनरूप एक स्वादरूप प्रात्माके होनेपर भी स्वादको भेदरूप करता हुआ शुभ तथा अशुभ अज्ञानरूप भाव को अज्ञानी करता है । वह आत्मा उस समय उस भावसे तन्मय होनेसे उस भावके व्यापकताके कारण उस भावका कर्ता होता है । तथा वह भाव भी उस समय उस प्रात्माको तन्मयतासे उस आत्माका व्याप्य होता है, इसलिये उसका कर्म होता है । वहो पात्मा उस समय उस भावको तन्मयतासे उस भावका भावक होनेके कारण उसका अनुभव करने वाला होता है। वह भान भी उस समय उस आत्माके तन्मयपनेसे आत्माके भावने योग्य होनेके कारण अनूभवने योग्य (भोगने योग्य) होता है । इस प्रकार अज्ञानी भी परभावका की नहीं है। भावार्थ---अज्ञानी भी अपने प्रशानभावरूप शुभाशुभभावोंका ही प्रज्ञान अवस्थामें कर्ता भोक्ता है, परद्रव्यके भाबका कर्ता भोक्ता नहीं है। प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्व गाथामें बताया गया था कि ज्ञानी ज्ञानका ही कर्ता है। अब इसी संदर्भसे सम्बन्धित यह तथ्य इस गाथामें बताया है कि वास्तवमें प्रज्ञानो जीव भी
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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