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________________ हुआ। उन शीत ऋतुओंके दिनों में बिलोकसार व कर्मकाण्डके विशप शान-अनुसंधान में लग रहा था। अत: समयमारके मननका समय ४ बजे प्रातः से लेकर ६ बजे तक का था। समप्रसार ग्रन्थक देखनेका यह पहिला ही प्रश्सर था। आत्म-हयाति टीकाके आधार पर मनन शुरू किया। उममें ओ बीच-बीच में कही कठिनाइयां आती थी, उनका हल श्री पं. जयचन्द जी छावड़ा त हिन्दी टोकास हो जाया करता था। इस प्रकार यह हिन्दी टोका भी मुझे बहुत ही सहायक रही । एतद में श्री पं. जयचन्द जी छाबड़ाका भी विशेष आभार मानता हूं। पूज्य श्री १०५ क्षु. गणेशप्रसाद जी वर्णी न्यायाचार्यका तो मैं अत्यन्त आभारी है जिनके तत्वावधान में बाल्यकाल से ही न्यायतीर्थ परीक्षा पर्यन्त मेरा अध्ययन रहा और न्याय विषयको स्वयं आपने पाया । अध्ययनके अतिरियन आरम-विकासमार्गमें चलने के लिये आपमे ही दीक्षा प्राप्त हुई। ओ३म शान्ति: ओ३म शान्तिः ओम शान्तिः मनोहर वर्णी सन् १९५८ में स्वलिखित समयर महिमासे (सहजानन्द) नयचक-प्रकाश पाठ १–नयज्ञानको प्रावश्यकता वस्तुका ज्ञान प्रमाण और नयोंसे होता है । वस्तु उत्पादध्ययोग्यात्मक है। प्रोब्य न हो तो उत्पाद व्यय नहीं हो सकता, उत्पाद व्यय न हो तो धोन्य नहीं हो सकता । धौव्यसे वस्तुके इम्मपनका बोध होता है। उत्पाद व्ययसे वस्तु के पयायपनेका बोध होता है। वस्तु द्रव्यपर्यायात्मक है। वस्तुका व्यष्टिसे भी ज्ञान हो, पर्यायष्टिसमी ज्ञान हो तो उसका पूर्ण ज्ञान होता है। एक दृष्टि से ज्ञान करमेको नय कहते हैं। दोनों दृष्टियों से ज्ञान करनेको प्रमाण कहते हैं। प्रयोगत: नमोसे वस्तुका ज्ञान होनेपर प्रमाणसे ज्ञान होता है और प्रमाणसे शान होनेपर नयोंसे ज्ञान होता है । प्रमाण के बिना निरपेक्ष नयों से ज्ञान होना मिथ्या है और प्रमाणपूर्वक नयोंसे ज्ञान होना सम्पद है क्योंकि, प्रमाणसे ग्रहण किये गये पदार्योका अभिप्राय वश एकदेश ग्रहण करनेवाले ज्ञानको नय कहते हैं। वस्तु शाश्वत निरन्तर द्रव्यपर्यायात्मक है। पर्यायके बिना दव्य नहीं रह सकता सो पर्याथ प्रतिक्षण होती रहती हैं। ट्रष्यके विना पर्याय किसमें हो सो अन्वय बिना पर्याय हो ही नहीं सकती। इस प्रकार जब वस्तु सदा द्रध्यपर्यायात्मक है तो द्रव्यष्टि से व पर्यायष्टिसे वस्तुका ज्ञान करना आवश्यक है। नयों के विस्तार में जितने भी नय हैं वे सब इन्हीं दोनों दृष्टियों के भेद प्रभेद हैं । निक, यह है कि वस्तुका परिचय पाने के लिये नयज्ञानकी महती आवश्यकता है। भले ही नय व प्रमाणके विकल्पसे अतिक्रान्त होकर हो आत्मानुभव होता है, किन्तु इस अतिक्रमणकी योग्यता वस्तुका परिचय किये बिना नहीं पाई जा सकती है। पाठ२-नयोंके संक्षिप्त प्रकार वस्नु द्रव्य पर्यायात्मक है। उसको जानने के लिये नयके मूल दो प्रकार आते हैं १-द्रव्याथिक नय, २-पर्यायाथिक नय । द्रव्य हो जिसका प्रयोजन हो उस नयको न्यायिक नय कहते हैं व पर्याय ही जिसका प्रयोजन हो उम नयको पर्यायाथिक नय कहते हैं। द्रव्याथिक नयके ३ प्रकार हैं.-१. मैगम नय, २. संग्रह मय, ३. व्यवहार नय 1 पर्यायाथिक नयके ४ प्रकार हैं--१. ऋजसत्र नय, २. शब्द नय, ३. समभिरून नय, ४. एवंभूत नथ । इस प्रकार नप हुप। इन मात नयोंमें ३ विभाग होते हैं-१-जाननय, २-अर्थनय व ३ .-गब्बनय । नमम नय तो ज्ञानमय है क्योकि वह संकल्प मात्रको प्रकट करता है, पदार्थको मुख्यतया नहीं कहता। संग्रह नय, व्यवहार मय क जमूत्र नय अर्थनय कहलाते हैं, क्योकि ये पदार्थकी जानकारी कराते हैं। संग्रह नय व व्यवहार नय लो ब्यष्टिकी मुरुषतास
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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