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________________ कर्तृकर्माधिकार सम्यग्विज्ञानघनस्वभावो भवतीति ज्ञानासबनिवृत्त्योः समकालत्वं । इत्येवं विरिचय्य संप्रति परद्रव्यानिवृत्ति परां, स्वं विज्ञान घन स्वभावमभयादास्तिघ्नुबानः परं । अज्ञानोतियतकर्तृकर्मकल. नात् क्लेशान्तिवृत्तः स्वयं, ज्ञानीभूत इतश्चकास्ति जगतः साक्षी पुराणः पुमान् ।।४८।। ।।७४।। एते-प्रथमा बहु० । अवा:-प्रथमा बहु० । अनित्या:-प्रथमा बहु० । तथा-अव्यय । अशरणा:-प्रथमा बह० । च-अव्यय । दुःखाः-प्रथमा बहु० । दुःखफला:-प्रथमा बहु० । इति-अव्यय । ज्ञात्वा-असमाप्तिकी क्रिया कृदन्त । निवर्तते वर्तमान लट् अन्य पुष एकवचन क्रिया! तेभ्यः-पंचमी बहुवचन ।।७४।। निवृत्ति इन दोनों में परस्पर दोनों ओरसे साध्यसाधकभाव है । ६- ज्ञानविकास तब तक बढ़ता रहता है जब तक पूर्ण प्रास्रवनिवृत्ति हो जाय । १०- प्रास्त्रवनिवृत्ति तब तक होती चली जाती है जब तक पूर्ण ज्ञानस्वभाव प्रकट हो जाय । सिद्धान्त-१-क्रोधादि यात्रव कर्मविपाकोदय होनेपर जीवमें निबद्ध होनेसे जीवस्वभावसे विरुद्धस्वभाव हैं। २-- क्षणिक कर्मविपाकोदय होने पर हुए जीवविभाव अशरण हैं वे एक क्षणसे अधिक ठहर नहीं सकते । ३-भेदज्ञानातिशयसे कर्मत्व क्षीण होता है । ४- कर्मस्व विघटनसे अात्माकी स्वच्छताका प्रसार होता है । दृष्टि-- --- उपाधिसापेक्ष प्रशुद्ध द्रव्याथिकनय (५३)। २- अशुद्ध सूक्ष्मऋजुसूत्रनय नामक पर्यायाधिकनय (३४) 1 ३- शुद्धभावनापेक्ष शुद्ध द्रव्याथिकनय (२४ब)। ४- उपाध्यभावापेक्ष शुद्ध द्रव्याधिकनय (२४ अ)। प्रयोग-विषय कषायभावोंको अध्र व, अशरण, दुःखरूप व दुःख फल वाले निरस कर उनसे उपयोगमुख मोड़कर अविकार अात्मस्वरूपमें विश्राम करना चाहिये ।।७४।। अब इसी अर्थ तथा आगेके कथनकी सूचनारूप काव्य कहते हैं-इत्येवं इत्यादि । अर्थ-पहले कही हुई रीतिसे परद्रव्यसे उत्कृष्ट सब प्रकार निवृत्ति कर और विज्ञानधन स्वभावरूप केवल अपने प्रात्याको निःशंक प्रास्तिक्यभावरूप स्थिरीभूत करता हुआ अज्ञानसे हुई कर्ता-कर्मको प्रवृत्तिके अभ्याससे हुए क्लेशोंसे निवृत्त हुप्रा स्व ज्ञानस्वरूप होता हुआ जगतका साक्षी पुराण पुरुष (प्रात्मा) अब यहाँसे प्रकाशमान होता है ।। यहाँ जिज्ञासा होती कि कोई प्रात्मा ज्ञानी हुआ यह कैसे पहचाना जा सकता है ? उसका उत्तररूप गाथा कहते हैं:--[यः] जो [प्रात्मा] जीव [एन] इस [कर्मणः परिणाम च] कर्मके परिणामको [च तथैव ] और उसी भांति [नोकर्मणः परिणामं] नोकर्मके परिणामको [न करोति] नहीं करता है, परंतु [जानाति] जानता है [सः] वह [ज्ञानो] ज्ञानी [भवति] है। टोकार्थ-वस्तुतः प्रात्मा मोह, राग, द्वेष, सुख दुःख प्रादि स्वरूपसे अन्तरंगमें उत्पत्र
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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