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________________ कर्तृकर्माधिकार १५३ केन विधिनायमात्रवेभ्यो निवर्तत इति चेत् - अहमिक्को खलु सुद्धो णिम्ममयो णाणदंसणसमग्गो। तमि ठिो तच्चित्तो सब्वे एए खयं णोमि ॥ ७३ ॥ मैं एक शुद्ध केवल, निर्ममत सुयुक्त ज्ञानदर्शनसे । इसमें लीन हुमा सब, पात्रय प्रक्षीण करता हूँ ॥७३॥ अहमेकः खलु शुद्धः निर्ममतः ज्ञानदर्शनसमग्रः । तस्मिन स्थितस्तच्चित्तः सनितान क्षयं नयामि ॥७३॥ अहमयमात्मा प्रत्यक्षमक्षुण्णमनंतं चिन्मात्र ज्योतिरनाद्यनंतनित्योदितविज्ञानघनस्वभावभावत्वादेकः । सकलकारकचक्रप्रक्रियोत्तीर्णनिर्मलानुभूतिमात्रत्वाच्छुद्धः । पुदगलस्वामिकस्य क्रोधादिभाववैश्यरूपस्य स्वस्य स्वामित्वेन नित्यमेवापरिणमनानिममतः । चिन्मात्रस्य महसो वस्तुस्वभावत एव सामान्यविशेषाभ्या सकलत्वाद् ज्ञानदर्शनसमग्नः । गगनादिवत्पारमाधिको वस्तुविशेषोस्मि तदहमधुनास्मिन्नेवालमनि निखिलपरद्रध्यप्रवृत्तिनिवृत्या निश्चलमवतिष्ठमानः नामसंज्ञ-अम्ह, इक्क, खलु, सुद्ध, णिम्ममा गाणदसणसमग्ग, त, ठिा, तच्चित्त, सन्च, एत, खय । धातुसंज- ट्ठा गति निवृत्ती, विख क्षये, ने प्रापणे । प्रातिपदिक-अरमद, एक, खलु, शुद्ध, निर्ममत, ज्ञानदर्शनसमग्र तत. स्थित, तच्चित्त, सर्व एतत, क्षय । मलधात शुश्च शौचे दिवादि अथवा शन्ध शनी भ्वादि, ष्ठा गतिनिवृत्ती, चिती संज्ञाने भ्वादि, चित संचतने चुरादि, क्षि क्षये, गोत्र प्रापणे भ्वादि । पद. ऐसे समुद्र के भंवरकी तरह शीध्र हो दूर किये हैं समस्त विकल्प जिसने, ऐसा निविकल्प, प्रचलित, निर्मल पात्माका अवलंबन करता या विज्ञानधनभूत यह आत्मा प्रास्रवोंसे निवृत्त होता है। भावार्थ---शुद्धनयसे ज्ञानीने प्रात्माका ऐसा निश्चय किया कि मैं एक हूँ, शुद्ध हूं, परद्रध्यके प्रति ममतारहित हूं, ज्ञान दर्शनसे पूर्ण वस्तु हूं, सो जब ऐसे अपने स्वरूप में स्थित होनेसे ज्ञानी उसीका अनुभव रूप हो, तब क्रोधादिक प्रास्त्रव क्षयको प्राप्त होते हैं। जैसे समुद्रको भंवरने बहुत कालसे जहाजको पकड़ रक्खा था, पीछे किसी कालमें भेवर पलटती है तब वह जहाजको छोड़ देती है, उसी प्रकार प्रात्मा विकल्पोंको भंवरको उपशान्त करता हमा प्रास्रवोंको छोड़ देता है। प्रसंगविवरण-अनन्तरपूर्व गाथामें यह बताया गया था कि ज्ञानमात्रसे ही बन्ध. निरोध होता है । सो इस सम्बन्धमें यह जिज्ञासा होना प्राकृतिक है कि वह विधि क्या है कि जिससे यह ज्ञाता प्रास्रवोंसे हट जाये । इसी जिज्ञासाका समाधान इस गाथामें है । तथ्यप्रकाश - (१) प्रत्येक प्रातमा अपने पाप सहज प्रखण्ड अविनाशो चिन्मात्र ज्योतिस्वरूप है । (२) प्रत्येक प्रात्मा सहज त्रिकाल ज्ञानघनस्वभाव है । (३) प्रत्येक पात्मा
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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