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________________ जीवाजीवाधिकार एसपि स्थितमेव यत्रागादयो भावा न जीवा इति मोहम्मदा दुवfष्णया जे इमे गुणट्ठाणा । ते कह हवंति जीवा जे णिच्चमचेदणा उत्ता ॥ ६८ ॥ १३६ जो भि गुणस्थान कहे, होते सब मोहकर्मके कारण । उन सब अचेतनोंको, फिर कैसे जीव कह सकते ॥ ६८ ॥ मोहनकर्मण उदयास्तु वर्णितानि यानीमानि गुणस्थानानि तानि कथं भवति जीवा यानि नित्यमचेतनान्युक्तानि । मिथ्यादृष्ट्यादीनि गुणस्थानानि हि पोद्गलिकमोहकर्म प्रकृतिविपाकपूर्वकत्वे सति नित्यमचेतनत्वात् कारणानुविधायीनि कार्याणीति कृत्वा यवपूर्वका यवा यवा एवेति न्यायेन पुद्· गल एव न तु जीवः । गुणस्थानानां नित्यमचेतनत्वं चागमाच्चैतन्यस्वभावव्याप्तस्यात्मनोतिरि कत्वेन विवेचकः स्वयमुपलभ्यमानत्वाच्च प्रसाध्यं । एवं रागद्वेषमोहप्रत्यय कर्मनो कर्मव व गंणास्पर्द्धकाध्यात्म स्थानानुभागस्यानयोगस्थान बंधस्थानोदयस्थानमार्गेरणास्थान स्थितिबंध स्थान संक्लेश नामसंज्ञ - मोहणकम्म, उदय, दु, वण्णिय, ज, इम, गुणट्ठाण, त, कह, जीव, ज, णिच्चं, अचेदण, उत्त । धातुसंज्ञ - उद्-अय गती, वण्ण वर्णने, हव सत्तायां । प्रातिपदिक - मोहनकर्मन्, उदय, तु, वर्णित, प्रत्यय, कर्म, नौकर्म, वर्ग, वर्गणा, स्पर्धक, अध्यात्मस्थान, अनुभागस्थान, योगस्थान, बंधस्थान, उदयस्थान, मार्गणास्थान, स्थितिबंधस्थान, संक्लेशस्थान, विशुद्धिस्थान संयमलब्धिस्थान --ये सभी पुद्गलकर्मपूर्वक होनेसे नित्य प्रचेतन होने के कारण पुद्गल ही हैं, जीव नहीं हैं, ऐसा स्वयं (अपने श्राप ) सिद्ध हुआ, इसलिये रागादिक भाव जीव नहीं हैं, ऐसा सिद्ध हुआ । मावार्थ- पुद्गल कर्मके उदयका निमित्त पाकर हुए चैतन्यके विकार भी पुगल हो हैं, क्योंकि शुद्ध द्रव्यार्थिकनयको दृष्टिमें चैतन्य प्रभेदरूप है और इसके परिणाम भी स्वाभा विक शुद्ध ज्ञान दर्शन हैं । इस कारण परनिमित्तसे होने वाले विकार चैतन्यसरीखे दोखते हैं, तो भी चैतन्यकी सर्व अवस्थाओं में व्यापक नहीं हैं । इसलिये वे स्वभाव चैतन्यशून्य (जड़) हैं इस तरह जो जड़ है वह पुद्गल है, ऐसा निश्चय हुभा । यहाँ पूछते हैं कि यदि वर्णादिक और रागादिक जीव नहीं हैं तो जीव नया है ? उसका उत्तररूप श्लोक कहते हैं-- अनाद्यनंत इत्यादि । अर्थ- श्रनादि अनन्त, अचल, स्पष्ट स्वसंवेद्य चैतन्य जो अत्यन्त प्रकाशमान हो रहा है, वह स्वयं ही जीव है । अब चेतनत्व ही जीवका लक्षण है ऐसा काव्य द्वारा कहते हैं-- वर्णाद्यः इत्यादि । - चूंकि वर्णादिसे सहित तथा वर्णादिसे रहित यों अजीव पदार्थ दो प्रकारके हैं याने धर्म, धर्म, आकाश और काल — ये चार प्रजीव तो वर्णादि भावसे रहित हैं और पुद्गल वर्णादि
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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